एक लड़की की शादी

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, मर्दों की साझेदारी 18 Comments »

नासिरूद्दीन

जहन में एक बात हमेशा कौंधती है, क्‍या लड़की की जिंदगी का सारा सफर शादी पर ही खत्‍म होता है।  मैं अक्‍सर सोचता हूँ कि दसवीं, बारहवीं में जो लड़कियाँ हर इम्‍तेहान में लड़कों से बाजी मारती रहती हैं, कुछ दिनों बाद ऊँची तालीम, नौकरी और जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों में क्‍यों नहीं दिखाई देतीं? कहाँ गायब हो जाती हैं?
लड़की पैदा हुई नहीं कि शादी की चिंता। उसके लिए एफडी की फिक्र। उसके नैन-नक्‍श, दांत की बुनावट, पढ़ाई-लिखाई, काम-काज की चिंता भी शादी के लिए ही? यही नहीं शादी को लेकर जितनी कल्‍पनाएँ लड़कियों की झोली में डाल दी जाती हैं, वह उनके पूरी दिमागी बुनावट पर असर डालता है। फिर वह भी इसी में झूलती रहती हैं। पढ़ो इसलिए कि अच्‍छा वर मिले। हँसो ठीक से ताकि ससुराल में जग हँसाई न हो। चलो ऐसे कि ‘चाल चलन’ पर कोई उँगली न उठे। चेहरा-मोहरा इसलिए सँवारो ताकि देखने वाला तुरंत पसंद कर ले। यह सब भी इसलिए ताकि ‘सुंदर- सुशील- घरेलू’ के खाँचे में फिट हो सके।
क्‍या माँ-बाप कभी किसी लड़के को ताउम्र शादी की ऐसी तैयारी कराते हैं। क्‍या कभी किसी लड़के से शादी की ऐसी तैयारी की उम्‍मीद की जाती है। क्‍या किसी लड़के की जिंदगी की सारी तैयारी का गोल सिर्फ और सिर्फ शादी होता है। शायद नहीं। तो क्‍यों नहीं?
क्‍यों सिर्फ लड़कियाँ?
शादी की भी तैयारी कैसे होती है। लड़की 18 की हुई नहीं कि माँ-बाप रिश्‍तेदारों की निगाहें लड़के ढूँढने लगती हैं। लड़का और‍ सिर्फ लड़का। लड़की बड़ी होती जाती है। घर वालों के खुसुर पुसुर बढ़ते जाते हैं। माथे की सिलवटें बढ़ने लगती हैं। लड़की अपने आप में सिमटती जाती है। कई बार उलाहने सुनती है। माँ- बाप हुए तो कम। अगर नहीं तो फिर जो होता है, वही जानती है। भाई- भाभी- बहन सब पर भारी। हर आदमी एहसान जताने को तैयार। कोई कहता है, हम अपने बच्‍चों को देखें या इन्‍हें। अपनी खुशी में वो अपनी बहनों को शामिल करने से हिचकता है। शामिल करता है तो उसे लगता है, उसका शेयर कोई दूसरा हड़प रहा है। जब दुल्‍हे की तलाश शुरू होती है तो पहले खानदान-लड़का-पैसा देखा जाता है। उसकी शराफत की कोई चर्चा नहीं होती। क्‍योंकि लड़के को कैसा कैरेक्‍टर सर्टिफिकेट देना। लड़की की उम्र बढ़ती जाती है। बोझ बढ़ता जाता है। बोझ को उतारने की जल्‍दबाजी होती है।  फिर जिस तिस लड़के को पकड़ कर खड़ा कर दिया जाता है। कई बार खानदान का हवाला तो कई बार लड़के के धार्मिक या दीनदार होने का वास्‍ता दिया जाता है। जैसे दीनदार होना ईमानदार और शरीफ होने की गारंटी हो।
लड़की की रजामंदी- यह किस चिडि़या का नाम है। इस मौके पर सब भूल जाते हैं कि वह इंसान है। इस्‍लाम ने तो सबसे पहले लड़की की रजामंदी की बात की है। लेकिन यहां दीनदारी हवा में उड़ जाती है। सब का दावा होता है- हम अपनी लड़की का भला- बुरा सबसे अच्‍छा समझते हैं। क्‍या उसे कुएँ में ढकेलेंगे। जो हम कहेंगे, वह मेरी लड़की करेगी। मेरी लड़की शरीफ है। यानी शराफत गूंगी होने का नाम है। जब सब तय कर लिया जाता है तो उस लड़की को खबर दे दी जाती है। यह खबर ही उसकी रजामंदी होती है। कोई उसके दिल में झाँक कर नहीं देखता। सब खुशियों का ढोल पीटते हैं और लड़कियाँ… यह तो वही बता सकती हैं। कुछ खुश होती हैं, चूँकि यह रिवाज है। कुछ चुप हो जाती है, जो उनकी शराफत का नमूना मान लिया जाता है। कुछ उधेड़बुन में रहती है… पर कुछ कह नहीं पाती… कहीं कुछ और न सोच लिया जाए।
फिर एक ऐसी जिंदगी शुरू होती है। जिसमें उस लड़की को सिर्फ करना ही होता है। जिम्‍मेदारियों से लदी-फदी जिंदगी। कर्तव्‍य के नाम शहीद जिंदगी। उसकी ख्‍वाहिश और उसके जज्‍बात सब दूसरों के नाम हो जाते हैं। उसीमें वह खुश भी रहती हैं- चूँकि पितृसत्‍ता यही सीखाता है।
विचारों की बड़ी मजबूत श्रृंखला है जनाब। जैसे- भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है। कहीं से निकाल कर लाया जाता है कि शौहर मजाजी खुदा है। शौहर के पैर के नीचे जन्‍नत होती है। शौहर को नाराज करेगी तो फरिश्‍ते बद़दुआ देंगे। (न जाने किसी शौहर के लिए ऐसी बात कहीं कही भी जाती है या नहीं)। एक कमासुत मर्द का साया उसकी जिंदगी के लिए जरूरी शर्त बना दी जाती है। बन जाती है। वह भी इसे ही जरूरी समझती है। किसी को लगता है कि बाजार में अपने मर्द के साथ में चलने में ही शान है। तो किसी को अपनी आगे की जिंदगी गुजारने का यही जरिया समझ में आता है। समझा दिया जाता है। यानी लड़कियों को इस दायरे से बाहर सोचने का मौका ही नहीं दिया जाता। एक पंगु दिमाग तैयार किया जाता है। जो गुलाम दिमाग होता है। बस करो, सवाल नहीं करो।
और तो और कहा जाता है, बेटी की डोली जाती है और अर्थी ही उठती है। फिर लड़की अर्थी बनने के लिए ताउम्र घसीटती रहती है। उसे हर ख्‍वाहिश भूलनी पड़ती है। उसे हर वो चीज भूलने की नसीहतें मिलती हैं, जो पवित्र परिवार के राह में रोड़े के रूप में देखा जाता है। वह भूलती है कि उसे एमए करना है। शादी से पहले कहा जाता था, बहुत पढ़ लिया अब शादी करनी है। शादी के बाद कहा जाता है, क्‍या घर चलाना है। तू वह काम कर जिसके लिए बनी है। यानी नौकरी के बोझ से लौटे पति की सेवा कर। वह भूलने लगती है कि उसे फोटो खींचने का शौक था। वह भूल जाती है कि उसे दूसरों के लिए काम करना अच्‍छा लगता था। उसे अपने गुण याद नहीं रहते और अवगुण उसे याद दिलाए जाते रहते हैं। वह भूल जाती है कि उसे किताब पढ़ना कितना अच्‍छा लगता था। उसे सपने में कभी याद आता हो तो आता हो कि पहली बार दोस्‍तों संग जब पहाड़ पर गई तो कैसे फोटो खिंचवाई थी। लगता था सारा आसमां उसी की मुट़ठी में है। उसे यह भी याद नहीं रखने दिया जाता कि वह अपने लिए जी सकती है। अपने लिए जीना… सोचना भी हराम है। उसे तो शहीद होना सिखाया गया है। पहले घरवालों के लिए। फिर ससुरालियों के लिए। उससे बच गई तो बच्‍चों के लिए। कभी ख्‍वाब के दरीचे खुले तो सारा समाज उसके आगे खड़ा हो जाता है। तुम अपने लिए सोच कैसे सकती हो?
मैं शादी के खिलाफ नहीं हूँ। प्रेम की शादी हो तो बिना झिझक, पूरी दुनिया से लोहा लेकर करना चाहिए। लेकिन जो शादी परस्‍पर प्रेम पर आधारित नहीं है, बराबरी पर आधारित नहीं है, वह शादी ताउम्र गैरबराबरी को बढ़ावा देगी और उस गैरबराबरी में हमेशा लड़की का दर्जा नीचे होगा। यही हमारे समाज के ज्‍यादातर लड़कियों की कहानी है।
तो क्‍या शादी बिना भी जिंदगी का कोई दरीचा खुलता है?

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