… पोती नहीं होगी आपको ?

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पाँच)

जी हाँ

बेटा है आपका

पगड़ी आपकी सलामत

बेटा पैदा करने की पूरी

कीमत वसूलेंगे आप

माँगेंगे दहेज और कहेंगे

बेटी है आपकी

जो है उसी का है

कम लाई तो ताना देंगे

मारेंगे..

सच है कि बेटा ही है आपका

बेटी का बोझ न खौफ।

पर क्या गारण्टी इसकी

पोती नहीं होगी आपको…

कुछ मर्दों के साथ भी हिंसा होती है लेकिन …

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इसकी तुलना महिला के खिलाफ होने

वाली हिंसा से कतई नहीं की जा सकती

नासिरूद्दीन

nasir 6 july new ढाका। हिंसा वही करता है जिसके पास सत्ता की ताकत होती है। कई बार यह ताकत कुछ औरतों के पास भी होती है। फिर वे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का दायरा काफी बड़ा है। इसकी तुलना पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा से कतई नहीं की जा सकती।

क्या घरों में सिर्फ औरतें ही हिंसा की शिकार होती हैं, मर्द नहीं? ढाका में जेण्डर समानता और महिला हिंसा के खिलाफ दक्षिण एशियाई देशों के संवाद में जब ‘हिन्दुस्तान’ ने इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन के गैरी बार्कर के सामने जब यह सवाल पेश किया तो वे थोड़ा रुके। होंठ भींचा और एक-एक शब्द तौलते हुए बोलना शुरू किया। ‘कुछ पुरुष मानसिक हिंसा के शिकार होते हैं। दक्षिण एशिया में घर के अंदर कुछ महिलाओं के पास सीमित सत्ता शक्ति होती है। वे इसका इस्तेमाल कई बार मर्दों, बच्चों और ससुरालियों के साथ हिंसा के रूप में करती हैं। यही नहीं महिलाओं का सामाजीकरण ऐसा होता है कि वे भावनाओं को ज्यादा खुले तौर पर जहिर कर पाती हैं। कई बार यही पुरुषों के साथ मानसिक हिंसा की वजह होती है।’ लेकिन गैरी आगाह करते हैं, महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा की तुलना, पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा से नहीं की जा सकती। महिलाओं के साथ हिंसा काफी व्‍यापक और और कई तरह का है। उसकी जटिलताएँ काफी है। इसलिए यह मुद्दा उठाते वक्‍त काफी एहतियात बरते जाने की जरूरत है।

हिंसा के खिलाफ मर्द-5

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

नासिरूद्दीन

वहीं सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस, दिल्ली के डॉ. अभिजीत दास का कहना है ‘हिंसा चाहे जो करे गलत है। लेकिन हमें देखने होगा कि यह हिंसा कहाँ से आ रही है। क्या यह सामाजिक संरचना और विभेद की उपज है या फिर उत्पीड़न की प्रतिक्रिया है? अगर यह सामाजिक संरचना की वजह से हो रहा है यानी सत्ता स्थापित करने के लिए तो जहिर यह गंभीर मसला है। … और आमतौर पर पुरुष संरचना की वजह स्त्री की हिंसा के शिकार नहीं होते। ’ कुछ ही ऐसी राय बीस सालों से हिमाचल में समुदाय के साथ काम करने वाले सुभाष मेंढापुरकर की है।

लेकिन गैरी, सुभाष और अभिजीत जब यह कहते हैं तो साथ-साथ वे इसके खतरे से भी आगाह करते हैं। सुभाष कहते हैं कि अगर एक हजर में 999 औरतें हिंसा की शिकार हैं तो मर्द केवल एक होंगे। यही नहीं कई बार हिंसक मर्द अपने करतूत को जयज ठहराने के लिए इस तर्क का इस्तेमाल करेंगे। इसलिए यह जरूरी है कि जब हम घर में मर्दों के साथ होने वाली हिंसा की बात करें तो काफी सतर्क रहें।

वहीं, मदुरैई में काम करने वाली संस्था एकता की विमला चंदशेखर कहती हैं कि पुरुषों के साथ हिंसा होती है लेकिन पुरुष की हिंसा और औरत की हिंसा को एक तराजू पर नहीं तौला ज सकता। औरत की जिंदगी ज्यादा हिंसा के साये में रहती है। खतरे भी ज्यादा उठाने पड़ते हैं। मर्द को हर पग उठाने से पहले सोचना नहीं पड़ता।

(हिन्‍दुस्‍तान से साभार)

महिला आंदोलन की जरूरत है मर्दों की भागीदारी

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आंदोलन को ही आगे बढ़ाएगी मर्दों की साझेदारी

नासिरूद्दीनnasir 6 july new

ढाका। बराबरी के लिए और हिंसा के खिलाफ आवाज तो महिला संगठन और आंदोलन उठाते रहे हैं। अब मर्दों की साझेदारी की बात हो रही है… तो क्या महिला आंदोलन इसके लिए तैयार है? सवाल उठ रहे हैं कि कहीं आंदोलन को पुरुष अपने कब्जे में तो नहीं ले लेंगे? आंदोलन अपने मकसद से भटक तो नहीं जाएगा? ढाका में पिछले महीने आयोजित दक्षिण एशियाई देशों के संवाद में भी ऐसे कई सवाल हवा में तैरते रहे।

संयुक्त राष्ट्र महिला विकास कोष (यूनीफेम), दिल्ली की सलाहकार मधुबाला नाथ कहती हैं, ‘जहाँ जेण्डर की समझ गड़बड़ होगी, वहीं महिला आंदोलन को परेशानी होगी। .. फिर यह तो नैरोबी में विश्व महिला सम्मेलन में तय हुआ था कि जेण्डर समानता के लिए मर्दों के साथ काम करना जरूरी है।’

हिंसा के खिलाफ मर्द-4

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

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दूसरी ओर, इस्लामाबाद की संस्था ‘रोजन’ की सह निदेशक मारिया रशीद कहती हैं कि इतने सवाल कहाँ उठते हैं। हम महिला संगठन हैं। हम तो दस सालों से मर्दों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। यह जरूरत भी आंदोलन से ही पैदा हुई। महिलाओं ने मर्दों को हमेशा प्रॉब्लम के रूप में देखा है अब उन्हें हल के रूप में भी देखना होगा। मर्दों को भी हिंसा का असर समझने के लिए आपस में होने वाली हिंसा को देखना होगा। वहीं इस्लामाबाद की ही डॉ. रखशंदा परवीन कहती हैं कि सच तो यह है कि महिला आंदोलन से इस मुद्दे पर ज्यादा गुफ्तुगू नहीं हुई। हाँ, कुछ चीख-पुकार जरूर मचेगी, लेकिन जुड़ाव की कोशिश जरूरी है।

जबकि मदुरैई की संस्था ‘एकता’ की निदेशक और आंदोलन से जुड़ीं विमला चंद्रशेखर कहती हैं कि मर्दों की भागीदारी हमारी जरूरत है। जब हम औरतों के पास काम करने जाते हैं तो वे कहती हैं कि हमारे पास कुछ करने की ताकत नहीं है। आप मर्दों के साथ क्यों नहीं बात करतीं? महिलाओं ने ही हमें इस राह पर ढकेला है।

हालाँकि डॉ. रखशंदा आगाह करती हैं कि ‘एक बात ध्यान रखें कि मर्दों की भागेदारी की वकालत कर हम महिला आंदोलन से प्रतियोगिता करने नहीं निकले हैं। मैं जेण्डर समरसता में यकीन करती हूँ। हाँ, संसाधनों के बँटवारे को लेकर जरूर मुश्किल आएगी।’ तो मारिया का कहना है, ‘गौर करने वाली बात यह है कि मर्दों की भागीदारी पर ज्यादा जोर कहीं अलगाव न पैदा कर दे।’ लेकिन मधुबाला की राय है, ‘महिला आंदोलन से मर्दों की इस मुहिम में शामिल होने के मुद्दे पर बात की जाएगी। यह उनके काम को ही आगे बढ़ाएगा।’ महिला संगठनों को उनकी सलाह है, ‘मर्दों की भागीदारी से डरने की कतई जरूरत नहीं है।’

विमला एक अहम बात की ओर ध्यान दिलाती हैं, ‘… सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। मर्दों पर ‘मर्दानगी’ का बोझ है। समाज भी मर्दों से खास तरीके से व्यवहार करने की उम्मीद

करता है। उन्हें हिंसक बनाता है और उस हिंसा को वैधता देता है। इसे समझने की जरूरत है।’

इन सबका कोई फायदा होगा? मधुबाला के मुताबिक, ‘यूनीफेम मर्दों की भागेदारी और साझेदारी को जरूरी मानता है। इसके फायदे होंगे। एक उदाहरण देखें- मर्दों के साथ काम कर उनके खतरनाक व्यवहार को रोका जा सकता है। इससे एचआईवी जैसे संक्रमण से औरतों को बचाने में मदद मिलेगी।’ वहीं मारिया का अनुभव है कि मर्दों के साथ काम करने का असर दिख रहा है। वह बताती हैं, ‘हमने पुलिस के साथ काम किया। उनके व्यवहार और काम में फर्क आया है।’

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मन पर वार करती है हिंसा

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nasir 6 july new बच्चे-बच्चियों की खातिर हिंसा से करें तौबा

नासिरूद्दीन

ढाका। घर में होने वाली हिंसा महिलाओं-बच्चे और बच्चियों पर जबरदस्त असर डाल रही है। उनकी शख्सीयत को प्रभावित कर रही हैं। वे कैसे इन्सान बनेंगे, इस बात की बुनियाद भी इससे तय हो रही है। कई रिसर्च इस बात की तस्दीक कर रहे हैं। ढाका में आयोजित संवाद के दौरान इंटरनेशन सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन के गैरी बार्कर से जब जेण्डर आधारित हिंसा के असर के बारे में सवाल किए गए तो उन्होंने तफसील से बताया। पेश है बातचीत की निचोड़

हिंसा के खिलाफ मर्द-3

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

नासिरूद्दीन


  • महिलाओं-बच्चे-बच्चियों पर असर

  • हिंसा से डर पैदा होता है। डर उन्हें कई बार आक्रामक बनाता है।
  • बच्चों को स्कूल में परेशानी होती है। सीखने की सलाहियत कम हो जाती है। ध्यान नहीं लगा पाते।
  • बच्चे-बच्चियों में यह विचार पैदा होता है कि हिंसा सामान्य बात है। जब जरूरत पड़े तो हम भी हिंसा का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • बेइज्जती और शर्म का अहसास

  • एक तमाचा शरीर को कम ‘मन और अहम’ को ज्यादा चोट पहुँचाता है। यह चोट हिंसा को बढ़ावा देती है। यानी घाव से ज्यादा शर्म हिंसा को बढ़ावा देती है।
  • अगर कोई महिला या बच्चा लगातार हिंसा के शिकार हो रहे हैं या हिंसा के माहौल में जी रहे हैं तो उसमें डर वाले हार्मोन बढ़ जते हैं।
  • ये हार्मोन हैं- कार्टिसोल और एंड्रेलिन। इसकी जाँच खून से हो सकती है। वसे तो यह जरूरी हार्मोन हैं जो हमें खतरे से अलर्ट करते हैं। लेकिन कोई लगातार अलर्ट की हालत में रहे तो उसकी दिमागी दशा क्या होगी?
  • लड़कियों पर असर

  • यूरोप और अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि हिंसा के माहौल में परवरिश पाने वाली लड़कियाँ हिंसा को सामान्य मानकर अपना लेती हैं।
  • उनका खुद पर भरोसा खत्म हो जता है। शख्सीयत में टूटन और बिखराव पैदा होता है।
  • हिंसा से बचने के लिए मदद लेने से परहेज करती हैं।
  • डिप्रेशन, तनाव और नाउम्मीदी की शिकार हो जती हैं।
  • लड़कों पर असर

  • जहाँ ज्यादातर लड़कियों हिंसा को अंदरूनी तौर पर आत्मसात करती हैं वहीं लड़कों में इसका असर बाहरी तौर पर ज्यादा दिखाई देता है।
  • दूसरों के साथ आक्रामक व्यवहार करते हैं। बात-बात पर हिंसा का सहारा लेते हैं।
  • ऐसे लड़के बड़े होने पर अपने निजी रिश्ते में भी हिंसा का जमकर इस्तेमाल करते हैं।

  • और जो हिंसा करते हैं,क्या उनपर भी कोई असर होता है? हाँ, जो हिंसक होते हैं उनमें

  • अपराधबोध की भावना घर कर जती है।
  • कई बार शर्मिदगी का अहसास होता है।
  • सब कुछ खो जने का अहसास। हिंसा की वजह से रिश्ते में दरार और नुकसान की भावना पैदा होती है।
  • नाकामी का अहसास होता है।
  • कुछ ऐसे भी मर्द हैं जिन्हें हिंसा के बाद संतुष्टि मिलती है।
  • छोटी-छोटी बातों की अभिव्यक्ति हिंसक रूप में करते हैं।
  • काम में नुकसान और चिड़िचिड़ापन बढ़ जता है।

तो हिंसा के इतने और ऐसे-ऐसे असर! इसलिए बेहतर आज और बेहतर कल के लिए, बेहतर जिंदगी और इन्सान के लिए, बेहतर समाज और घर के लिए जेण्डर समानता पर आधारित हिंसा मुक्त माहौल बनाया जना जरूरी है।

DHAKA REPORT-3

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सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी में है हिंसा की जड़ें

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nasir 6 july new

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ। नासिरूद्दीन

हिंसा के खिलाफ मर्द-२

ढाका।सवाल है जब हिंसा प्राकृतिक नहीं है तो यह पैदा कहाँ से होती है? गैरी बार्कर ने इस पर काफी शोध किया है। बार्कर इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन, वाशिंगटन से जुड़े हैं। महिला हिंसा रोकने में मर्दो को भागीदार बनाने के जबरदस्त पैरोकार हैं। बांग्लादेश की राजधानी में आयोजित संवाद में गैरी से जब जेण्डर आधारित हिंसा के कारणों पर बातचीत हुई तो उन्होंने कई सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक वजहें गिना डालीं।

वह बात शुरू करते हैं, पितृसत्तात्मक व्यवस्था महिलाओं को कमतर बना कर रखती है। जैसे, उनके पास सम्पत्ति के हक नहीं हैं। आमदनी में भी कम हैं। यह गैरबराबरी मर्दो को शक्ति देती है। वे औरतों को काबू में करके रखते हैं। यही सत्ता शक्ति हिंसा की वजह बनती हैं। यही नहीं, वही मर्द जो घर में औरत के साथ हिंसक होता है, बाहरी दुनिया में ऐसी ही वर्गीय विभेद और गैरबराबरी के कारण खुद भी हिंसा का शिकार होता है। इसलिए मर्दो को इसे समझना चाहिए।

हिंसा की एक वजह वैश्वीकरण है, ऐसा गैरी मानते हैं। उनके मुताबिक, ‘पैदावार के पारम्परिक तरीके और पुश्तैनी पेशे खत्म हो रहे हैं। खेती से लेकर घरेलू उद्योगों तक यही हाल है। ऊपर से हमारा सामाजीकरण ऐसा है जो मर्दो को ही पैसा कमाने का जिम्मेदार बनाता है। मर्दानगी से भी इसे अटूट रूप से जोड़ा गया है। यानी जो कमाकर न लाए या घर का खर्च न उठाए वो मर्द नहीं। अब जब मर्द के पास पैसे कमाने के साधन नहीं बचे या नाकाफी हैं तो वह प्रतियोगिता में अपने को हारा हुआ मान रहा है। नतीजतन, शराबखोरी, पैसे से सेक्स खरीदना, परिवार में पत्नी और बच्चे के साथ हिंसा, एचआईवी संक्रमण और आत्महत्या जसी बुराइयाँ जड़ जमा रही हैं।’

जहाँ तक मीडिया की बात है, गैरी कहते हैं कि आज दस-दस रुपए में सीडी और डीवीडी मिल रही है। केबल है। इंटरनेट का जाल है। छवियों की भरमार है जो महिला विरोधी है। इन सबके जरिए महिला के शरीर को बिकने लायक वस्तु के रूप में पेश किया जा रहा है। यौन जिंदगी में मनमानेपन को बढ़ावा दिया जा रहा है। यही मनमानापन हिंसा को जन्म दे रहा है।

गैरी राष्ट्रवाद के उभार को भी महिला हिंसा के लिए अहम वजह के रूप में देखते हैं। बकौल गैरी, जो भी विचार कथित राष्ट्रवादियों से मेल नहीं खाता, वे उसे विदेशी बना देते हैं। वे हिन्दुत्ववादी संगठनों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मैंगलोर में लड़कियों पर हमला इसी विचार की देन है। वह महिलाओं पर तालीबान के जुल्म की याद दिलाते हैं। उनका मानना है कि यह हिन्दू धर्म और इस्लाम की लिंग भेद पर आधारित व्याख्या का नतीज है। हिंसा रोकने के लिए इसे चुनौती देना जरूरी है।

सैन्यीकरण और जंग का माहौल, घरों में हिंसा का बड़ा कारण है। गैरी के मुताबिक, युद्ध के खतरे की वजह से लाखों सैनिकों को हमेशा ‘सावधान’ रहना पड़ता है। वे सावधान या मरने-मारने को तब ही तैयार रहेंगे जब युद्ध यानी हिंसा का महिमामंडन किया जाए। उसकी शौर्यगाथाएँ गाईं जाएँ। मरने-मारने को महान काम बताए जाए। वह बताते हैं, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल सैनिकों की बीवियों के अध्ययन से पता चला है कि वे जबरदस्त हिंसा की शिकार हैं। और हिंसा होगी क्यों नहीं? यह कैसे मुमकिन है कि बाहर तो उन्हें क्रूर हिंसक बनना सीखाइए और घर में उनसे अहिंसक होने की उम्मीद की जाए!

यानी अगर गैरी की बात पर गौर करें तो अगर जेण्डर आधारित हिंसा को रोकना है तो इन वजहों पर गौर करना होगा। वरना मुमकिन नहीं की इस हिंसा को महज नारों से रोका जा सके।

मीडिया जटलिताओं को सामने लाए

गैरी बार्कर मानते हैं कि मीडिया का फैलाव मजबूत लोकतंत्र की निशानी है। लेकिन मीडिया से उनकी कुछ गुजारिश है। वह कहते हैं कि मीडिया हमें ज्यादातर हिंसा की पीड़ित और हिंसक व्यक्ति की दास्तान ही बताता है। वह इसे दो व्यक्तियों के टकराव के रूप में ही पेश करता है। इससे उबरने की जरूरत है। उनकी सलाह है कि मीडिया हिंसा की जटलिताओं को सामने लेकर आए।

(’हिन्‍दुस्‍तान’ से साभार)

मर्दानगी ही सीखनी है तो महात्‍मा गांधी से क्‍यों नहीं सीखते

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महिला हिंसा खत्म करने को मर्दो का साथ जरूरी

नासिरूद्दीन

ढाका। ‘‘महिलाओं ने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। नीतियाँ और कानून बनाने के लिए जद्दोजहद किया। … लेकिन अब महिला आंदोलन को मर्दो के साथ की सख्त जरूरत है। बिना मर्दो को भागीदार बनाए हुए महिला हिंसा खत्म नहीं की ज सकती।’’

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ। नासिरूद्दीन

यह जेम्स लैंग के खयाल हैं। हिंसा रोकने में मर्दो को शामिल करने की पुरजोर पैरोकारी करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के चार अहम संस्थानों (यूनीएफपीए-यूनीडीपी-यूनीफेम-यूएनवी) की पहल पर बने पार्टनर्स फॉर प्रिवेंशनके मुखिया हैं। ढाका में जेम्स को मैंने जब इस मुद्दे पर सवालों से कुरेदा तो उनका कहना था, जेण्डर सम्बंध में मर्द-औरत दोनों शामिल हैं। आमतौर पर यह सम्बंध गैरबराबरी वाला है। यही हिंसा की वजह भी है।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में महिला हिंसा रोकने के लिए काम कर रहे नेटवर्क मैसवाके सतीश सिंह का कहना है कि अगर मर्द समस्या के हिस्सा हैं तो इसके समाधान में भी उन्हें शामिल होना होगा। चूँकि वे ही मर्दानगी वाले सामाजिक मूल्य और नियम तय करते हैं।

हालाँकि जेम्स और सतीश का इस बात पर जोर है कि हिंसा बच्चों/ मर्दो का प्राकृतिक गुण नहीं है। यह गुण उन्हें परवरिश के दौरान मिलता है। यह बदला ज सकता है। इसलिए वकल्पिक मर्दानगी पर काम करने की जरूरत है। सतीश इसे साफ करते हैं, चूँकि दुनिया के सारे मर्द हिंसक नहीं हैं, इसलिए बाकि भी अहिंसक हो सकते हैं।

बकौल जेम्स, शांतिप्रिय और स्नेहमयी रिश्ते के लिए यह जरूरी है। हमें मर्दो को सिर्फ हिंसक के रूप नहीं देखने की जरूरत नहीं है बल्कि मानवमात्र के रूप में भी देखने की जरूत है। जबकि सतीश की राय है कि हिंसा से मर्द भी प्रभावित होते हैं। इसलिए पुरुषों को सीखना चाहिए कि मानवाधिकार का सम्मान कैसे करें।

इस आंदोलन को दक्षिण एशिया में काफी उम्मीद है। यहाँ बने बनाए खाँचे से अलग मर्दानगी के ढेरों उदाहरण हैं। ये अहिंसक हैं। स्नेह और लाड लुटाने वाले हैं। महिलाओं और बच्चों के लिए संवेदनशील भी। .. और महात्मा गांधी से बेहतर इसका उदाहरण कौन हो सकता है। जेम्स का सवाल है, ‘क्या गांधी मर्द नहीं थे? मजहबी रहनुमाओं को लें, वे भी तो अमन और अहिंसा की बात बताते हैं। मर्दानगी को इस तरह क्यों नहीं देखा जता?’

क्योंकि जेम्स का कहना है, हॉलीवुड हो या बॉलीवुड वे दिखाते हैं कि किस तरह एक मर्द, दूसरे मर्द से एक लड़की को पानेके लिए लड़ता है। वे अपना नंगा बदन हाथ में हथियार लिए युवाओं के सामने ऐसा ही असली मर्दकी छवि पेश करते हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हमारी असली जिंदगी में किसी लड़की का प्यार ऐसे मिलता है? नहीं न! मिलती है सिर्फ हिंसा।

दक्षिण एशियाई देशों ने रणनीति बनाई

ढाका। महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में मर्दो को आगे लाने के लिए दक्षिण एशियाई देश मिलकर काम करने ज रहे हैं। इसमें खास तौर पर किशोरों के साथ काम करने पर जोर होगा। वकल्पिक मर्दानगी के विचार को आम करने की कोशिश होगी।

पिछले हफ्ते बांग्लादेश की राजधानी में तीन दिनों तक चले जेण्डर समानता ओर हिंसा रोकने में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने पर दक्षिण एशियाई देशों के बीच संवाद में यह फैसला किया गया। संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनीएफपी, यूएनडीपी, यूनीफेम, यूएवी के बैनर तले आयोजित इस संवाद में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, कम्बोडिया, अफगानिस्तान, श्रीलंका के नेटवर्क, नागरिक संगठन, शिक्षक, पत्रकार, सरकार और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

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