महिला हिंसा खत्म करने को मर्दो का साथ जरूरी
नासिरूद्दीन
ढाका। ‘‘महिलाओं ने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। नीतियाँ और कानून बनाने के लिए जद्दोजहद किया। … लेकिन अब महिला आंदोलन को मर्दो के साथ की सख्त जरूरत है। बिना मर्दो को भागीदार बनाए हुए महिला हिंसा खत्म नहीं की ज सकती।’’
पिछले दिनों बांग्लादेश की राजधानी ढाका में जेण्डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्त राष्ट्र संगठन के विभिन्न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्दुस्तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ। नासिरूद्दीन
यह जेम्स लैंग के खयाल हैं। हिंसा रोकने में मर्दो को शामिल करने की पुरजोर पैरोकारी करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के चार अहम संस्थानों (यूनीएफपीए-यूनीडीपी-यूनीफेम-यूएनवी) की पहल पर बने ‘पार्टनर्स फॉर प्रिवेंशन’ के मुखिया हैं। ढाका में जेम्स को मैंने जब इस मुद्दे पर सवालों से कुरेदा तो उनका कहना था, जेण्डर सम्बंध में मर्द-औरत दोनों शामिल हैं। आमतौर पर यह सम्बंध गैरबराबरी वाला है। यही हिंसा की वजह भी है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में महिला हिंसा रोकने के लिए काम कर रहे नेटवर्क ‘मैसवा’ के सतीश सिंह का कहना है कि अगर मर्द समस्या के हिस्सा हैं तो इसके समाधान में भी उन्हें शामिल होना होगा। चूँकि वे ही मर्दानगी वाले सामाजिक मूल्य और नियम तय करते हैं।
हालाँकि जेम्स और सतीश का इस बात पर जोर है कि हिंसा बच्चों/ मर्दो का प्राकृतिक गुण नहीं है। यह गुण उन्हें परवरिश के दौरान मिलता है। यह बदला ज सकता है। इसलिए वकल्पिक मर्दानगी पर काम करने की जरूरत है। सतीश इसे साफ करते हैं, चूँकि दुनिया के सारे मर्द हिंसक नहीं हैं, इसलिए बाकि भी अहिंसक हो सकते हैं।
बकौल जेम्स, शांतिप्रिय और स्नेहमयी रिश्ते के लिए यह जरूरी है। हमें मर्दो को सिर्फ हिंसक के रूप नहीं देखने की जरूरत नहीं है बल्कि मानवमात्र के रूप में भी देखने की जरूत है। जबकि सतीश की राय है कि हिंसा से मर्द भी प्रभावित होते हैं। इसलिए पुरुषों को सीखना चाहिए कि मानवाधिकार का सम्मान कैसे करें।
इस आंदोलन को दक्षिण एशिया में काफी उम्मीद है। यहाँ बने बनाए खाँचे से अलग मर्दानगी के ढेरों उदाहरण हैं। ये अहिंसक हैं। स्नेह और लाड लुटाने वाले हैं। महिलाओं और बच्चों के लिए संवेदनशील भी। .. और महात्मा गांधी से बेहतर इसका उदाहरण कौन हो सकता है। जेम्स का सवाल है, ‘क्या गांधी मर्द नहीं थे? मजहबी रहनुमाओं को लें, वे भी तो अमन और अहिंसा की बात बताते हैं। मर्दानगी को इस तरह क्यों नहीं देखा जता?’
क्योंकि जेम्स का कहना है, हॉलीवुड हो या बॉलीवुड वे दिखाते हैं कि किस तरह एक मर्द, दूसरे मर्द से एक लड़की को ‘पाने’ के लिए लड़ता है। वे अपना नंगा बदन हाथ में हथियार लिए युवाओं के सामने ऐसा ही ‘असली मर्द’ की छवि पेश करते हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हमारी असली जिंदगी में किसी लड़की का प्यार ऐसे मिलता है? नहीं न! मिलती है सिर्फ हिंसा।
दक्षिण एशियाई देशों ने रणनीति बनाई
ढाका। महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में मर्दो को आगे लाने के लिए दक्षिण एशियाई देश मिलकर काम करने ज रहे हैं। इसमें खास तौर पर किशोरों के साथ काम करने पर जोर होगा। वकल्पिक मर्दानगी के विचार को आम करने की कोशिश होगी।
पिछले हफ्ते बांग्लादेश की राजधानी में तीन दिनों तक चले जेण्डर समानता ओर हिंसा रोकने में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने पर दक्षिण एशियाई देशों के बीच संवाद में यह फैसला किया गया। संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनीएफपी, यूएनडीपी, यूनीफेम, यूएवी के बैनर तले आयोजित इस संवाद में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, कम्बोडिया, अफगानिस्तान, श्रीलंका के नेटवर्क, नागरिक संगठन, शिक्षक, पत्रकार, सरकार और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

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