बिन मारे बैरी मरै, या सुख कहाँ समाय

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 2 Comments »

लोगों के नजरिये में है बेटियों के न होने का ‘उत्सव’

जितना सुख खेत में खड़ी ईख के बिकने से होता है, वैसा ही सुख जनमते बेटी के मरने से और अगर शादी से पहले बेटी मर गयी तो क्या कहने? यह अपनी तन से पैदा हुई ‘तनया’ के बारे में बुंदेलखंड के एक हिस्‍से के लोगों की राय है। बेटा है तो जीवन तरेगा … और अगर बेटियाँ हो गईं तो माँ का बुरा हाल। उनका होना कितना दु:ख का सबब है और चले जाना सुख का। इसे बुंदेलों की सरजमीं पर आसानी से देखा/ समझा और महसूस किया जा सकता है। इस होने न होने में लोगों का नजरिया और सामाजिक सच्चाई भी सामने आती है। … ऐसी सोच वाले समाज में भ्रूण का लिंग परीक्षण बढ़ना स्वाभाविक ही है।

कोख बदलने वाले बाबा

जी हाँ, कर्वी में एक ऐसे बाबा भी हैं जो कोख बदल देते हैं। लोग तो यही कहते हैं। जो लिंग परीक्षण से डरते हैं या कन्या भ्रूण मारने से डरते हैं, वे बाबा की शरण में जाते हैं। … यानी बस कोई बेटा दिला दे। फूलमती को पहले बेटी हुई। दूसरी बार माँ बनने की बारी आयी। उसने सुन रखा था कि शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक क्षेत्र (नाम नहीं दिया जा रहा) में एक बाबा देवी देवता की पूजा करके कोख बदल देते हैं। दवा भी देते हैं। बाबा के ‘पुण्य प्रताप’ से फूलमती को बेटा हो गया। कई और महिलाएँ भी दौड़ीं, मगर अफसोस… उन्‍हें पुत्र न हुआ।

पुत्र जीवन कल्प वृक्ष

सीता ने भले ही राम का साथ निभाते हुए चित्रकूट के जंगलों और पहाड़ों में जिंदगी के कई अहम साल गुजारे हों पर यहाँ लोग जानकी (बिटिया) के बजाय राम (बेटा) की ख्वाहिश में आते हैं। यह महज संयोग नहीं है कि पुत्र चाह वाले इस क्षेत्र में एक ऐसा वृक्ष है, जहाँ पुत्र की मनौती माँगने दूर-दूर से औरत-मर्द आते हैं।

‘पुत्र जीवन कल्प वृक्ष’! यही नाम है चित्रकूट के एक मंदिर (नाम नहीं दिया जा रहा) में लगे पेड़ का। सिंदूर से पुते तने को देखकर अंदाजा लग जाता है कि यहाँ बड़ी तादाद में लोग आते हैं। एक बुजुर्ग साधु के मुताबिक इस पेड़ को लगभग पाँच सौ साल पहले रीवा नरेश बद्रीनाथ से सोने की पालकी में लेकर आये थे। यह पेड़ संभवत: अपने तरह का अकेला है। पुत्र की कामना करने वाले जोड़े यहाँ सिंदूर और शुद्ध घी के मिश्रण को अपने हाथों से पेड़ पर लगाते हैं और पूजा करते हैं। फिर पुत्र प्राप्ति के बाद दम्पति को यहाँ दान देना पड़ता है। एक स्थानीय आयुर्वेद डॉक्टर के मुताबिक यह कम पाया जाना वाला पेड़ है। हालांकि इसके औषधीय गुण के बारे में कोई नहीं बता सका।

बेटवा के हाथ तरै का होत हवै-

बेटा जरूरी क्यूँ, कर्वी (चित्रकूट) के कसहाई ग्राम सभा के एक गांव की उर्मिला का बयान है, ‘बेटियाँ हैं। लोग ताना देते हैं, मरेगी तो तरेगी नहीं। वंश नाश हो जायेगा।’ राजुल इसमें जोड़ती है, ‘बेटवा के हाथ से जीवन तर जात हवै, नीक हो या निकाम आखिर वंश तो चलावत है!’ बांदा के तिंदवारी की पुष्पा का भी मानना है, ‘बेटवा के हाथ तरै का होत हवै।’

पुत्र न हो इससे बड़ा सोग नहीं

‘समाज में मान्यता नहीं मिलती। कहते हैं औलाद नहीं हैं’- यह जनाब दो बेटियों के बाप खेती करने वाले रामसुमेर हैं। (मानो जैसे बेटी औलाद नहीं होती।) राधे लाल तो यहाँ तक बोल डालते हैं, ‘पुत्र न हो इससे बड़ा सोग नहीं। ऋण से बड़ा रोग नहीं।’

अगर बेटी हो गई तो… तो फिर माँ की जिंदगी ताने सुनते हुए बीतनी है। सेमरा (बांदा) की एक औरत कहती है, दिल से कभी नहीं निकलता की बेटी हो। बेटी हो गई तो माँ को पेट भर खाना नहीं मिलता।

कहीं फिर बेटी हो गई तो

बांदा की शहनाज का दर्द कुछ और है, ‘बच्ची को ठीक से दूध भी नहीं पिलाने देते। कहते हैं, रोने दो।’ सुनीता कुछ और जोड़ती है, ‘लड़की पैदा हुई तो घर में ऐसा माहौल हो जाता है जैसे कोई मर गया है। सब सोचते हैं लड़की मर जाए तो अच्छा है।’ बेटी होने का खौफ कोई आबादी के रामप्रीत से पूछे उसके तीन बेटियाँ है। गर्भवती है। डर रही है कहीं फिर बेटी हो गयी तो?

महतारिन की कोख में जाई-

उन औरतों का हाल और बुरा होता है जिनके बहनें ज्यादा होती हैं। कर्वी की रेनू की चार बहनें हैं। … जब वह गर्भवती हुई तो ससुराल वाले यही कहा करते थे, ‘इसकी माँ का वंश बेटियों वाला है तो इसका भी यही होगा। महतारिन की कोख में जाई।’ ऊषा को भी ताने मिलते हैं, ‘जउन तना महतारी निखरी रही हवै वहिनतना बिटियव होइंग हवै!’ और जब फूलमती को अपनी माँ की तरह बेटी ही हुई तो उसे सुनना पड़ा, ‘महतारी के कोख मा चली गे, यहूके बिटियै-बिटियै होइहै!’

… या सुख कहाँ समाय-

बेटियों के बारे में वाकई समाज इतना क्रूर है या फिर कोई करुण कथा- तय कर पाना कठिन है। बेटियों का न होने का उत्सव, यह सोचना भी सभ्य समाज में डरावना लगता है। पर इलाके में प्रचलित कहावतों का क्या करेंगे। उर्मिला के मुताबिक लोग बड़े उत्साह से कहते हैं, ‘बिन ब्याही बिटिया मरै, या सुख कहाँ समाय।’ तो एक संगठन में काम करने वाले जितेन्‍द्र इससे भी भयावह दो लाइन सुनाते हैं, ‘जनमत बिटिया जो मरै, ठाड़ी ऊख बिकाय। बिन मारे बैरी मरै, या सुख कहाँ समाय॥’

बकौल बुंदेलखंड विशेषज्ञ राधाकृष्ण बुंदेली, यहां तो कन्या को प्रणाम करने की परम्परा है। हम लड़कियों का बड़ा आदर करते हैं। .. इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी, जिसे प्रणाम करते हैं उसे ही नहीं चाहते!

(बुंदेलखंड में लिंग जाँच के बारे में एक सीरिज मैंने पाँच साल पहले लिखी थी। ये सिलसिलेवार तरीके से ‘हिन्दुस्तान’ में छपीं। जेण्डर जिहाद के लिए हिन्‍दुस्‍तान से साभार यहाँ फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि इस समस्या के बारे में जमीनी हकीकत समझने में आसानी हो।- नासिरूद्दीन)

इससे पहले की पोस्‍ट देखें-

बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा

चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पीएँ, बेटा होगा

… तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी

… और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा

अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, जिये तो जनम भर का

चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पीयें, बेटा होगा!

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 11 Comments »

नासिfoetusरूददीन हैदर खाँ

यह चूरन दूर देश तक मशहूर है। मशहूर हो भी क्यों न? पुत्र लिंग पैदा करने का जो दावा है। कोई विज्ञापन नहीं। कोई तामझाम और लुभाने वाली पैकिंग नहीं। बस पुड़िया में बाँध कर मिलेगी। एक चुटकी का कमाल! बुंदेलखंड ही क्यों हमारे समाज में पुत्र चाह कितनी मजबूत है, यह इन चीजों से भी पता चलता है।

बांदा शहर से कोई 15 किलोमीटर दूर सेमरा क्षेत्र में ऐसा ही चूरन मिलता है। सिर्फ इस चूरन की वजह से यह गाँव दूर-दूर तक जाना जाता है। मुख्य सड़क से काफी अंदर कच्चे-पक्के रास्ते से होकर आने में जितनी मशक्कत करनी पड़ती है, उसी से अंदाजा लगता है कि बेटे के लिए लोग कितने पापड़ बेलते हैं। इस पापड़ बेलने में लोगों को तनिक भी परेशानी नहीं है। ‘चिराग’ का सवाल है जनाब! यह ‘पुत्र चूरन जड़ी-बूटी’ मियाँ-बीवी की जोड़ी बेचती है।

(बुंदेलखंड में लिंग जाँच के बारे में एक सीरिज मैंने पाँच साल पहले लिखी थी। ये सिलसिलेवार तरीके से ‘हिन्दुस्तान’ में छपीं। जेण्डर जिहाद के लिए हिन्‍दुस्‍तान से साभार यहाँ फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि इस समस्या के बारे में जमीनी हकीकत समझने में आसानी हो।- नासिरूद्दीन

झोपड़ी में बैठी सुखमती (असली नाम नहीं) बताती है ‘‘पास के गाँव के एक ब्राह्मण बाबा से सीखे हैं। उनके पास एक वैद्यक (किताब) है, उसी में इस दवा का जिक्र है। भगवान का आशीर्वाद है और हाथ का जस भी।’’ एक चुटकी चूरन को गुड़ में मिलाकर एक पाव दूध के साथ तीन महीने तक हर रोज सुबह-सुबह गर्भवती महिला को पीना पड़ता है। किसी भी गाय का दूध नहीं चलेगा, बल्कि उसी गाय का असरदार होगा जिसने बछड़े को जन्म दिया हो। (जरा सोचिए न्, बछिया वाली गाय के दूध से पुत्र कैसे होगा!)

सुखमती का कहना है, ‘‘बिलासपुर, बांदा, झाँसी, कानपुर, चित्रकूट के तो लोग आते ही हैं, यह दवा सउदी अरब भी जाती है। किसी-किसी दिन तो खाने का टाइम नहीं मिलता, इतने लोग आ जाते हैं।’’ आसपास के कई लोगों के वह नाम गिनाती है, जिन्हें इस चूरन के ‘पुण्य प्रताप’ से लड़का हुआ है। इनमें हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। जब मैंने ‘बेटा चूरन’ यह कहकर माँगा कि मेरी पत्नी को एक माह का गर्भ है। तो सुखमती ने कहा, ‘‘सही समय है। एकदम कामयाब होगा चूरन।’’ यानी गर्भ ठहरने के बाद चूरन से भ्रूण का ‘लिंग’ बेटे वाला हो जायेगा!

पैसे के बारे में पूछने पर सुखमती बताती है, दो सौ-सौ, जो चाहो दे दो। लड़का होने पर ढेर सारे पैसे लोग दे जाते हैं। खूँटी पर टंगे नए कुर्ता-धोती की ओर इशारा करते हुए कहती है, ‘‘अभी एक जने को लड़का हुआ है, वही दे गए हैं।’’ वह चूरन ही नहीं देती बल्कि जच्च का पेट देखकर भी बता देती हैं कि गर्भ में लड़का है या लड़की।

कैप्सूल बढ़ाएगा पुत्र वाला क्रोमोसोम!

आयुर्वेद और पुराणों का बेटियों के खिलाफ कैसा इस्तेमाल हो रहा है, यह बांदा/ कर्वी और आसपास के बाजरों में बिकने वाली दवाओं से पता चलता है। यह दवाएँ दूसरे शहरों में भी मिलती हैं, लेकिन पिछड़ा समङो जाने वाले बुंदेलखंड में इनका बिकना स्त्रियों के संदर्भ में खास मायने रखता है।

एक सिरप है एसआरपी केमिकल इंडस्ट्रीज, हाथरस की ‘गर्भिणी’। इसके साथ पुत्रप्रदा योग दवा मुफ्त मिलती है। इस कम्पनी का कहना है कि गर्भ का लिंग निर्धारण 40 से 60 दिनों में होता है इसलिए इसे गर्भ धारण के बाद तीन माह तक पाँच-पाँच ग्राम सुबह-शामदूध के साथ खाना है। .. ताकि पुत्र पैदा हो! बांदा के अतर्रा कस्बे के दुकानदार के मुताबिक, इसकी खूब माँग है।

दूसरी ओर, एक और दवा है, ‘वाई स्पर’। बांदा शहर में बिक रही है। आयुर्वेदिक दवा है, लेकिन पुत्र चाह वाले ग्राहकों को नाराज नहीं करना है, इसलिए एलोपैथिक डॉक्टर भी इसे लिख रहे हैं। विल्को लैबोरेट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, भावनगर (गुजरात) का 30 कैप्सूलों वाला यह डिब्बा 384 रुपये पचास पैसे में बाजार में है।

एक डॉक्टर इसे सुबह शाम खाने की सलाह देते हैं। किन लोगों को देते हैं, पूछने पर डॉक्टर साहब बताते हैं, अक्सर बेटे के लिए परेशान रहने वाले लोग किसी दवा की माँग करते हैं तो उन्हें यह कैप्सूल खाने की सलाह देते हैं। इस दवा के करामात के बारे में इनका कहना है कि पुत्र के लिए जरूरी वाई क्रोमोसोम बनाने का दावा कम्पनी करती है। इसके साथ वो जोड़ते हैं, हालाँकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। आमतौर पर आयुर्वेदिक दवाओं के साथ दिये जाने वाले निर्देश इसमें नदारद है। शायद कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए यह होशियारी बरती गयी है।

क्या है पुत्र जीवक

इस कैप्सूल में मुख्य तत्व है, ‘पुत्र जीवक’। इसी तरह कई अन्य औषधियाँ भी इसी योग से बन रही हैं। इसके बारे में आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. वाचस्पति त्रिवेदी कहते हैं, एक फल होता है जिसके बीज में गिरी होती है, जिसे आयुर्वेद में ‘पुत्र जीवक’ के नाम से जाना जाता है। कई पौराणिक ग्रंथों और आयुर्वेद की पुस्तकों में इसका जिक्र मिलता।

डॉ. त्रिवेदी के मुताबिक यह पुत्रदायक योग का एक कारक है। जिस स्त्री को पुत्र न होता हो, गर्भ न ठहरता हो, गर्भ गिर जाता हो उसे यह दिया जाता है। इसी तरह पुरुषों में पौरुषता बढ़ाने के लिए दी जाती है।

कमाल यह है कि कुछ साल पहले एक विदेशी कम्पनी जब मनचाही संतान पैदा करने की दवा बेचने आयी तो कई संगठनों ने उसे पुत्र चाह की वजह से भारत के बिगड़ते लिंग अनुपात के लिए खतरनाक माना था। उस पर पाबंदी भी लगी। लेकिन इस वक्त बांदा/कर्वी/ चित्रकूट या फिर लखनऊ में ही ‘पुत्र’ वाली ऐसी दवाओं पर न तो हो हल्ला है और न ही कोई कार्रवाई। बस, बिटिया के एवज में बेटा देने के दावे का धंधा चालू आहे।

मौका हो तो इन्‍हें भी पढ़ें-

1. … तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी

2. … और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा

3. अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

4. लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, जिये तो जनम भर का

5. बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा

बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 2 Comments »

भ्रूण का लिंग परीक्षण करने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटरों की चाँदी

किसी काम की नहीं पीपीएनडीटी सलाहकार समिति

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

Foetus बेटा बताया बेटी हो गई… लायक नहीं हैं फिर भी अल्ट्रासाउंड मशीन चला रहे हैं … सरकारी डॉक्टर हैं पर लिंग जाँच कर कानून की खूब धज्जियाँ उड़ा रहे हैं… और करें भी क्यों न? न हींग लगे न फिटकरी ऊपर से रंग भी चोखा! इसमें तो मुनाफा ही मुनाफा है। और जिन पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी है, वह सब जानकर भी असहाय बने हैं। बांदा और चित्रकूट समेत सब जगह बिटिया को जड़ से खत्म करने के धंधे की यह विभत्स राम कहानी है।

(बुंदेलखंड में लिंग जाँच के बारे में एक सीरिज मैंने पाँच साल पहले लिखी थी। ये सिलसिलेवार तरीके से ‘हिन्दुस्तान’ में छपीं। जेण्डर जिहाद के लिए हिन्‍दुस्‍तान से साभार यहाँ फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि इस समस्या के बारे में जमीनी हकीकत समझने में आसानी हो।- नासिरूद्दीन)

नाकाबिल के हाथ मशीन- अल्ट्रासाउंड मशीन किसके हाथ में होगी, कानून इसके बारे में साफ है। भले ही कानून लागू कराने वालों की नजर धुँधली हो। मानकों के उलट बांदा से लगभग 40 किलोमीटर दूर अतर्रा कस्बे में एक अल्ट्रासाउंड सेंटर है। डॉक्टर एमबीबीएस नहीं हैं। रेडियोलॉजिस्ट नहीं है पर उनके नाम मशीन पंजीकृत है। इसी क्लीनिक में महिला रोग विशेषज्ञ भी बैठती हैं। आसपास के डॉक्टरों का भी यही हाल है। पता चला कि यहाँ आप लिंग जांच करा सकते हैं। इस क्लीनिक की जाँच की गुणवत्ता क्या होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसी तरह कर्वी में एक साहब की अल्ट्रासाउंड मशीन है। शहर से हटकर गाँवों के करीब। यहाँ किस माँग को पूरा किया जा रहा है? डॉक्टर साहब इलाहाबाद में सरकारी नौकरी में हैं और कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। कानून बना-लिंग जाँच नहीं होगी, पर होती है। साहब हफ्ते में एक दिन आते हैं। बाकी दिन, जानकारों के मुताबिक, पास के स्वास्थ्य केन्‍द्र के एक-दूसरे सरकारी डॉक्टर यहाँ ‘सेवा’ देते हैं। अल्ट्रासाउंड चलाने की योग्यता इनकी इतनी ही है कि ‘बेटी’ को ‘बेटा’ देखते हैं।

कानून इनके ठेंगे पर- दूसरी ओर, कानून कहता है कि लोगों को जागरूक करने के लिए सेंटर में लिखा होगा कि यहाँ लिंग जाँच नहीं होती है। साथ ही पंजीकरण प्रमाण पत्र भी लगाना होगा। दोनों ऐसी जगह पर चस्पा होना चाहिए जहाँ ये आसानी से दिख जाएँ। इसके उलट बांदा व कर्वी में अधिसंख्य जगहों पर इनका पता ही नहीं चला। उलटे डॉक्टर लोगों को किसी को भी जाँच के बारे में बताने से मना करते हैं। समझते हैं कि उसे जेल हो जाएगी। और उनके लिए लिंग जाँच के खतरे को उठाने के एवज में मुँहमाँगी रकम पाते हैं।

बेटा बताया हुई बेटी!

अल्ट्रासाउंड से किस तरह कमाई की जा रही है, इसका उदाहरण कर्वी की ओमवती है। इसने ‘क’… अल्ट्रासाउंड सेंटर में पाँच सौ रुपये में जाँच कराया। वह बताती है, डॉक्टर ने कहा, ‘मिठाई खिलाओ लड़का है। ससुराल वालों ने भी खूब देखभाल की।’ पर हुई बेटी। अब तानों की कमी नहीं। उसके परिजनों को इस ‘भूल’ पर बड़ा अफसोस है। यह घटना कम से रानी जैसे को यह कहने का मौका जरूर दे रही है, ‘मशीनौ गलत होत हवै।’ हालाँकि ऐसी गलतियाँ भी होंगी जहाँ लड़कों के भ्रूण को लड़की बताया जा रहा होगा और पुत्र भ्रूण को खत्म किया जा रहा होगा।

कितना मुनाफा चाहिए- यह धंधा कितना चोखा है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। अल्ट्रासाउंड करने वाले एक डॉक्टर साहब बताते हैं कि सामान्य जाँच के लिए 350 रुपए लिया जाता है। इसमें 100 रुपये जाँच के लिए भेजने वाले डॉक्टर का होता है। अल्‍ट्रासाउंड की लागत क्या आती होगी, पूछने पर वह बताते हैं, मुश्किल से चालीस रुपये। वह भी तब जब ग्राफिक रिपोर्ट देनी हो। लिंग जाँच के लिए न तो कोई कागज देना है और न ही रिपोर्ट। यानी सिर्फ देखकर बताना है …और कीमत 700 से ढाई हजार रुपये तक। (यह कीमत पाँच साल पहले थी।) मुनाफे का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है! फिर क्यों छोड़े कोई लिंग जाँच के धंधे को?

कानून के बारे में एक मशहूर और काबिल डॉक्टर साहब कहते हैं, यह तो इंस्पेक्टर राज जैसा है। जब कोई चाहेगा, निरीक्षण करने पहुँच जायेगा। वह बताते हैं कि लड़का-लड़की बताने के लिए लोगों का भारी दबाव रहता है। जैसी हालत देखी वैसा दाम लेते हैं! चार सौ से लेकर ढाई हजार तक।

कौन करे निगरानी- दूसरी ओर, कहीं लिंग जाँच तो नहीं हो रही, यह देखने के लिए हर जिले में सलाहकार समिति है। कर्वी में सलाहकार समिति की सदस्य सरस्वती बताती हैं ‘पिछले एक साल में पीपीएनडीटी कमेटी की सिर्फ एक बैठक हुई इसमें भी ज्यादातर सदस्य नदारद ही रहे।’ वह जानती हैं कि शहर में कहाँ लड़का/लड़की बताया जा रहा है। गाँवो-कस्बों से लोग आते हैं। यहाँ लिंग जाँच और एबार्शन क्लीनिक का गठजोड़ भी देखने को मिलता है। सरस्वती का मानना है कि चूँकि एबार्शन क्लीनिक चलानी है, इसमें ज्यादा पैसा है, इसलिए जितने लोग टेस्ट कराते हैं उसमें 90 फीसदी को यह लड़की ही बताते हैं। झाँसी और सतना से भी यहाँ के लोग इस काम के लिए जाते हैं, यह जानकारी सरस्वती देती हैं।

यह अदृश्य अपराध है। इसमें किसी को रंगे हाथ पकड़ना कठिन है। रंगे हाथ पकड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो प्रशासनिक अमले में नहीं दिखती। डॉक्टर-रेडियोलॉजिस्ट- अल्ट्रासाउंड सेंटर और पुत्र चाह के गठजोड़ को तोड़े बिना इस सिलसिले को रोकना मुश्किल होगा।

मौका मिले तो इन्‍हें भी पढिए-

… तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी

… और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा

अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, जिये तो जनम भर का

 

 

लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, जिये तो जनम भर का

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 6 Comments »

बुंदेलखंड की धरती पर धड़ल्ले से हो रही भ्रूण की लिंग जाँच

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

बांदा/चित्रकूट। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी- बुंदेलों के मुँह से स्त्री वीरता की हमने यही कहानी सुनी थी। लेकिन अब बुंदेलखंड में यह धुन ज्यादा सुनाई दे रही है-‘‘लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, लड़की जिये तो जनम भर का दु:ख।’’ लड़की यानी बेटियों के बारे में इस माटी के लोगों का यही नजरिया है। लखनऊ से 216 किलोमीटर दूर। पठार, जंगल और मौसम समेत हर चीज की ‘अति’ वाले इलाके में बिटिया के साथ भी अति है। हर जगह की तरह यहाँ भी बिटिया अनचाही हैं लेकिन ज्यादा खुले रूप में।

खुला इतना कि आप बांदा में हो या कर्वी में, जरा सी होशियारी बरतिये और आठ सौ से दो हजार के बीच में पता कीजिए कि गर्भ में पल रही संतान कौन सा लिंग लेकर आने वाली हैं। फिर उसी से उसके अस्तित्व का फैसला हो जएगा। बुंदेलखंड की प्यासी और बंजर पड़ी जमीन की मानिंद यहाँ की आबादी भी स्त्री जाति से धीरे-धीरे बंजर हो रही है। अतिश्योक्ति नहीं है। आँकड़े भी इसकी तस्दीक कर रहे हैं। 

पीपीएनडीटी अधिनियम के मुताबिक भ्रूण का लिंग जाँचना न सिर्फ अवैध है बल्कि इसके लिए सजाएँ भी हैं। लिंग जाँचने का सबसे सुगम साधन अल्ट्रासाउंड मशीनें हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद चेते स्वास्थ्य विभाग प्रशासन ने अल्ट्रासाउंड क्लीनिक का पंजीकरण तो करा लिया लेकिन बांदा और कर्वी के ज्यादातर केन्‍द्रों पर थोड़ा सम्हलकर, थोड़ा बचकर लिंग जाँच आसानी से हो रही है। फर्क इतना पड़ा है कि अब कानून की आड़ लेकर दाम जरूर बढ़ गए हैं। पहले जो काम 300-350 रुपए में हो जाता था, अब लिंग जाँचने के लिए आठ सौ से दो हजार रुपए तक लिए जा रहे हैं। यही नहीं डॉक्टर जाँच करवाने वालों को हिदायत भी देता है, ‘‘लिख कर नहीं देंगे। किसी से कहना नहीं, तुम्हें जेल हो जाएगी।’’ हाँ, अगर थोड़ी जान पहचान हुई तो दाम में कुछ कमी हो सकती है।

(बुंदेलखंड में लिंग जाँच के बारे में एक सीरिज मैंने पाँच साल पहले लिखी थी। ये सिलसिलेवार तरीके से ‘हिन्दुस्तान’ में छपीं। जेण्डर जिहाद के लिए हिन्‍दुस्‍तान से साभार यहाँ फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि इस समस्या के बारे में जमीनी हकीकत समझने में आसानी हो।- नासिरूद्दीन)

मैंने कई अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर खुद और दोस्तों की मदद से नकली ग्राहक बनकर इसकी जनकारी ली। बांदा के एक  केन्द्र पर डॉक्टर ने तो पहले मना किया लेकिन नर्स से बात करने पर 700 रुपए में जाँच की बात तय हो गई। एक केन्‍द्र पर तो पूछते ही रिसेप्शन पर बैठे व्यक्ति ने कहा, ‘‘हजार रुपए लगेंगे लेकिन लिखकर कुछ नहीं देंगे।’’ शहर के एक क्लिनिक पर अल्ट्रासाउंड कराने वाली महिलाओं को एक साथ एक जगह बैठाकर रखा गया था। जिन्हें देखने और फिर बात करने बाद पता चला कि वे सभी गर्भवती हैं और…। बांदा में एक और खास बात देखने को मिली। यहाँ अल्ट्रासाउंड और स्त्री रोग/ प्रसूति विशेषज्ञ साथ-साथ एक छत के नीचे मिले। एक मशहूर डॉक्टर ने तो पहले मना किया फिर अल्ट्रासाउंड करने वाले साहब ने हाँ कर दी। इसी तरह एक डॉक्टर साहिबा के आदमी ने बताया, ‘‘बता देंगे लड़का है या लड़की… अगर एबार्शन भी हमारे यहाँ कराया तो छूट मिल सकती है।’’ इस शहर में एक-दो डॉक्टर की ख्याति सिर्फ एबार्शन करने की वजह से है।

यही हाल चित्रकूट/कर्वी में देखने को मिली। लिंग चाँच कहाँ होगी, यह पता आपको कई पान दुकान वाले, मेडिकल स्टोर वाले और नीम-हकीम बता सकते हैं। चाहे वो बांदा कचहरी के पास का कोई मेडिकल स्टोर हो या फिर अतर्रा में दवा या पान बेचने वाला। कोई नीम-हकीम हुआ तो वह आपको सेंटर तक भी पहुँचा सकता है। उसका कमीशन जो तय है।

हालाँकि इस जाँच की पैठ देखनी है तो लोगों के बीच बैठें। हमने कुछ गाँवों का जायजा लिया। लोगों से बात की। जरा सा घुमा फिराकर पूछने पर गाँव वाले खुद ही बताने लगते हैं। शहर वालों की तरह ये मुखौटा पहन कर जो नहीं जीते। तिंदवारी थाना क्षेत्र के एक गाँव की पुष्पा एक डॉक्टर का नाम लेकर बताती है, ‘‘मशीन से जाँच करके बता देते हैं।’’ उर्मिला मशीन के चमत्कार से बहुत खुश है- ‘‘चार महीने का पेट था। दो हजार देकर जाँच कराया। डॉक्टर ने देखने के बाद बताया, मिठाई खिलाओ।’’ हालाँकि हमें सूरत में काम करने वाले श्याम और उनकी पत्नी रामप्रीत परेशान हाल मिलीं। इनकी पहले से तीन बेब्टियाँ हैं। बताने लगीं, ‘‘दो बार जाँच कराकर बच्चाtable bumdelkhand गिराया।’’ विडम्बना देखिए, जाँच तो अत्याधुनिक मशीन से काफी पैसा देकर कराया लेकिन गर्भपात बबुआइन (गाँव में जचगी कराने वाली महिला) से। नतीजा, रामप्रीत की बच्चादानी खिसक गई। वह काफी तकलीफ में रही। रामप्रीत अपने पति के पुत्र जिद से परेशान है। अब वह फिर पेट से है। कर्वी के एक गाँव की नूरजहाँ ने भी पहले गर्भ का लिंग पता किया। जब पता चला कि कन्या भ्रूण है तो गर्भपात करा दिया। बांदा शहर से करीब चालीस किलोमीटर दूर एक कस्बे में या फिर कर्वी शहर से थोड़ी हटकर किसी गाँव के नजदीक सुनसान इलाके में अल्ट्रासाउंड सेंटर देखकर थोड़ा ताज्जुब भी होता है। आखिर यहाँ क्यों? आसपास के इलाके में बात करने पर इसकी वजह पता चल जती है। कर्वी के मनोहर बताते हैं, ‘‘तीन बेटियाँ थीं। यहीं चेक कराया था। फिर…।’’ तो श्याम का कहना था, ‘‘पैदा करके मारना ज्यादा पाप है। पेट में तो पूरा जन नहीं रहता है। यही उपाय अच्छा है। डॉक्टर साहब बता देते हैं, फिर काम हो जता है।’’ तिंदवारी, अतर्रा, बबेरू, बांदा, नरैनी हो या फिर कर्वी और चित्रकूट। यही नहीं बांदा का अमरागाँव, जसपुरा हो या बसील या फिर बगरेही, रैपुरा, कुठलिआही या पाठा क्षेत्र के मानिकपुर तक लोग ‘मशीन’ की ख्याति जानते हैं। लोग खुद ही बताते हैं कि झाँसी, कानपुर और पड़ोस के सतना में भी ऐसी जाँच आसानी से हो जाती है। जाँच कराने वालों में छोटे किसान, बड़े किसान, पढ़े-लिखे नौकरीपेशा भी हैं। मुसलमानों में भी इस मशीन की करामाती चाह तेजी से बढ़ रही है। पहले राजपूत बेटियों के मामले में बदनाम थे अब इसमें ब्राह्मण, कुर्मी, यादव, दलित सब शामिल हो गए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दलित-मुसलमान या कमजोर आर्थिक या माली हालत वालों की पहले से दो-तीन बेटियाँ भी हैं।

 

 

अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

नासिरूद्दीन Nasiruddin, मुसलमान, मुस्लिम महिला Muslim Women, लिंग चयन Sex Selection 4 Comments »

कई लोगों को लगता है कि इस तरह की टिप्पिणियाँ या रपट खामख्वाह के मुद्दे उछालने का काम करती हैं। फिर वो इसकी तहकीकात में ढेर सारे ऐसे सवाल करते हैं, जिनका वर्तमान रपट से कम ताल्लुक होता है। मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग चयनित गर्भपात की क्या हालत है, उसको समझने के लिए ये चंद नमूने काफी हैं। अभी नहीं चेते तो काफी देर हो जएगी। आँख बंद कर लेने से हक़ीक़त बदल जाती तो क्या बात थी?

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

कन्या भ्रूण का गर्भपात कराने वाले शौहर के खिलाफ मुकदमा

गर्भ की लिंग जँच, फिर कन्या भ्रूण का गर्भपात और इसके खिलाफ माँ की शिकायत- यूपी में यह अपनी तरह का पहला मामला है। हिम्मत का यह काम किया फर्रुखाबाद के अतियापुर गाँव की एक मुस्लिम महिला रजिया ने। रजिया ने अपने शौहर के खिलाफ कन्या भ्रूण का जबरदस्ती गर्भपात कराने का मुकदमा किया है। रजिया के तीन बच्चे हैं। चौथी बार जब वह गर्भवती हुई तो उसके शौहर ने अल्ट्रासाउंड के लिए दबाव डाला। एक स्थानीय नर्सिंग होम में उसका अल्ट्रासाउंड कराया गया। इसमें पता चला कि गर्भ में कन्या है। रजिया पर गर्भ को गिराने का दबाव पड़ने लगा। रजिया ने इनकार किया तो उसके ससुरालियों और शौहर ने जुल्म ढहाना शुरू कर दिया। उसने पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाही पर नाकाम रही। आखिरकार किसी तरह वह 27 मार्च 2008 को एसपी लक्ष्मी सिंह से मिलने में कामयाब हुई और अपनी तकलीफ बयान की। इसके बाद एसपी ने महिला की ख्वाहिश के खिलाफ गर्भपात कराने का मुकदमा लिखने का हुक्म दिया। (स्रोत: प्रेट्र, 28 मार्च 2008, फर्रुखाबाद)

यह वाकया एक बार फिर साबित करता है कि मुसलमानों में भी लिंग चयन और कन्या भ्रूण के गर्भपात धड़ल्ले से हो रहे हैं। यह सिर्फ बड़े शहरों तक नहीं है। यह बीमारी छोटे शहरों और गाँवों तक पहुँच चुकी है। ( आगे पढ़ने के लिए क्लिक करने की तकलीफ करें)  Read the rest of this entry »

… और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा (Declining sex ratio among the Muslims-1)

इस्‍लाम Islam, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, मुस्लिम महिला Muslim Women, लिंग चयन Sex Selection 8 Comments »

Sana by Nasiruddin

और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’

(कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)

यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है। …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्‍यादातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है। … यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है। 

आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं। सचाई भी है। लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़। (आगे पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें) Read the rest of this entry »

… तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी (Declining sex ratio)

नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 9 Comments »

नासिरूद्दीन

ज़रा सोचिए अगर नवरात्र के मौके पर जिमाने के लिए चलती-फिरती कन्या की जगह मूर्तियों का सहारा लेना पड़े! अगर बेटियों को पैदा न होने देने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो हो सकता है कि आने वाले दिन ऐसे ही हों। नवरात्र के मौके पर जिमानेके लिए कन्याओंका ऐसी ही विकल्प तलाशना होगा। ऐसे संकेत न सिर्फ उत्तर प्रदेश में मिल रहे हैं बल्कि देश के कई और राज्यों में तो हालत बहुत ही खराब है। जी हाँ, अपने पुण्‍य के लिए बेटियों को हम पूजना चाहेंगे और वो हमें मिलेंगी नहीं।

यह किसी की दिमागी कल्पना नहीं है। प्रकृति के नियम के मुताबिक आबादी में स्त्री-पुरुष लगभग बराबर की संख्या में होने चाहिए। कम से कम स्त्री जाति तो कम नहीं ही होनी चाहिए। लेकिन सचाई क्या है? सन् 2001 में स्त्री और पुरुषों की गिनती से यह पता चला कि उत्तर प्रदेश की कुल आबादी से करीब 90 लाख औरतें कम हैं। इनमें हिन्दू पुरुषों की तुलना में अकेले 75 लाख तो हिन्दू औरतें गायब हैं। यानी जिन बेटियों को होना चाहिए था, वे नहीं हैं।

जिन्हें जिमाया जाता है, अब उन कन्याओं की तादाद का जायजा लें। प्रदेश में छह साल से कम उम्र के शिशुओं में लड़कों के मुकाबले लगभग 14 लाख लड़कियाँ कम हैं। यानी गायब हैं। ये बेटियाँ तो विशुद्घ रूप से पैदा नहीं होने दी गयीं या पैदा होने के बाद जिंदगी की उमंग से इन्हें मरहूम कर दिया गया। इन 14 लाख में अकेले हिन्दू समुदाय में लगभग पौने बारह लाख बेटियाँ, बेटों के मुकाबले कम हैं।

किसी समाज में स्त्री-पुरुष के हिसाब को देखने का एक तरीका है लिंग अनुपात (sex ratio)। यानी एक हजार मर्दों की तुलना में कितनी औरतें हैं। कायदे से हजार में हजार ही होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं का लिंग अनुपात 894 है (यानी प्रति हजार हिन्दू मर्दों पर 106 औरतें कम)। छह साल की कम उम्र की शिशुओं में यही संख्या 911 है (यानी प्रति हजार बच्चों पर 89 हिन्दू बच्चियाँ कम)। हालात की गम्भीरता का अंदाजा इसी एक आँकड़े से लगाया जा सकता है।

अगर पूरी हिन्दू आबादी को देखें तो अकेले उत्‍तर प्रदेश में 51 ऐसे जिले हैं, जहाँ कुल लिंग अनुपात डेढ़ सौ अंकों तक कम है। …और उत्तर प्रदेश में 70 में 27 जिले ऐसे हैं जहाँ प्रति हजार हिन्दू लड़कों पर लड़कियाँ (शिशु लिंग अनुपात) सौ से 180 की संख्या तक कम हैं। बेटों की चाह में हिन्दू बेटियों के खिलाफ खड़े होने वालों में वे जिले शामिल हैं, जिन्हें हम विकसित और धन-धान्य से भरपूर जिले मानते हैं। जैसे इस मामले में पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश का सहारनपुर (शिशु लिंग अनुपात-834), मुजफ्फरनगर (820), मेरठ (830), बागपत (820), गाजियाबाद (834), गौतम बुद्घ नगर (847), बुलंदशहर (855), अलीगढ़ (877), मथुरा (839), कानपुर नगर (863) और लखनऊ (909) आगे हैं। बेटियों को भ्रूण में ही खत्म करने का काम (sex selective abortion/ Female foeticide) सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे और पैसे वाले कर रहे हैं। इसमें अब धर्म और जातियों का भी भेद नहीं रहा।

इसीलिए अगर यही हाल रहा तो कहाँ से मिलेंगी नौ कन्या, नौ देवी स्वरूपा पूजने के लिए और जिमाने के लिए। …जमीन पर इसका असर दिख रहा है। नहीं मिल रही हैं कन्याएँ। खासकर लखनऊ जैसे बड़े शहरों और संभ्रांत कॉलोनियों में। लोगों से बात करने पर पता चलता है कि पहले अष्टमी को ही कन्या जिमाया जाता था। अब षष्ठी और सप्तमी को भी कन्या जिमाया जा रहा है। क्यों? क्योंकि अब नौ बेटियाँ बड़ी मुश्किल से मिल रही हैं। और एक ही बेटी को कई घरों में जीमनाहोता है। इसलिए एक दिन में कितना जीमेंगी, तो अलग-अलग घरों में कई दिनों में जीमती हैं। यही नहीं, अब नौ की संख्या पर भी जोर नहीं है, सात मिल जाए, पाँच मिल जाएँ- उतने से ही काम चलाया जा रहा है। आने वाले दिनों में क्या तीन और एक की नौबत आ जाएगी?

नवरात्र के मौके पर खासतौर पर देवी के रूपों की आराधना की जाती है। पर उसके बाद साल भर क्‍या हम अपनी स्त्री जाति की सुध लेते हैं। हमें जीवित देवियोंकी थोड़ी सुध लेनी चाहिए। वरना हम सिर्फ पाठ ही करते रहेंगे …या देवी… नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।और बेटियाँ जिंदगी के लिए जद्दोजेहद करती रहेंगी।

इस पोस्ट को अगर आप सुनना चाहें तो नीचे दिए गए प्लेयर को चलाएँ-

[audio:http://www.archive.org/download/DecliningSexRatioAmongHindus/KanyaJimana1.mp3]

अगर इस पोस्ट को डाउनलोड करने की ख्वाहिश है, तो यहाँ जाएँ।

मैं महसूस करना चाहती हूँ…

नासिरूद्दीन Nasiruddin, लिंग चयन Sex Selection 2 Comments »

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर

 

परिकल्पना/डिजायन/शब्द- नासिरूद्दीन

WP Theme & Icons by N.Design Studio. Indified by IndiBlogger.in.
Entries RSS Comments RSS Log in