सहती है क्यों औरत?

कविता, घरेलू हिंसा Domestic Violence, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 5 Comments »

छह)

तुम पूछते हो

सहती है क्यों औरत?

जवाब क्यों नहीं देती?

‘‘पिता-पति-पुत्र ही हैं स्त्री के रक्षक

बाप-शौहर-बेटा है निगहबान इसका

खानदान का नाम चलाता है बेटा

बोझ की खान है बेटियाँ

मर्द कमाता है, खिलाता है, पैसा लाता है

लाठी है बुढ़ापे की

इसीलिए दर्जा भी ऊँचा है उसका

.. और फिर औरत

भोग की वस्तु है

कहाँ मर्द- कहाँ औरत’’

तुमने रचे शास्त्र, गढ़े नियम,

बनाई मर्यादाओं की घेराबंदी

जवाब तुम्हारे ही पास है

कैसा क्रूर मजक

फिर भी करते हो सवाल

सहती है क्यों औरत?

… पोती नहीं होगी आपको ?

कविता, घरेलू हिंसा Domestic Violence, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin, हिंसा के खिलाफ मर्द 4 Comments »

पाँच)

जी हाँ

बेटा है आपका

पगड़ी आपकी सलामत

बेटा पैदा करने की पूरी

कीमत वसूलेंगे आप

माँगेंगे दहेज और कहेंगे

बेटी है आपकी

जो है उसी का है

कम लाई तो ताना देंगे

मारेंगे..

सच है कि बेटा ही है आपका

बेटी का बोझ न खौफ।

पर क्या गारण्टी इसकी

पोती नहीं होगी आपको…

‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

कविता, घरेलू हिंसा Domestic Violence, जेण्डर जिहाद Gender Jihad 5 Comments »

तीन)

अकड़ते हो

घमंड में चूर।

नहीं थकते शेखी बघारते

अपने को ‘मर्द’ कहते हो women

पर बड़े बेशर्म हो भई।

भैंस/स्कूटर/ कलर टीवी

या फिर चंद पैसे…

नहीं मिले तो

हिचकते नहीं

मारने से संगनी को!

चार)

भैंस चाहिए

स्कूटर और कलर टीवी भी

फ्रिज है तो माइक्रोवेव ओवन चाहिए

हाँ, अपना फ्लैट भी होना चाहिए

क्यों?

दुकान के लिए पगड़ी मिल जाती तो क्या कहने

और जिंदगी शुरू करने के लिए

थोड़ा सा कैश मिल जाता तो क्‍या खूब होता

नहीं?

…..

…..

अगर नहीं मिला?

तो नहीं चाहिए

‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

तो नहीं रहेगी

‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

बेटी पढ़ेगी तो…

कविता, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 8 Comments »

एक) women1

बेटी

पढ़े्गी तो

समझेगी दुनिया। 

बनेगी खुद मुख्‍तार

फिर खुद लिखेगी

अपनी तकदीर और

तय करेगी अपना सफर

……………………….

दो)

पढ़े्गी नहीं

तो

समझेगी कैसे

हुए क्‍यों हालात

बदतर?

पढ़ेगी नहीं तो

बदलेगी कैसे?

हक की खातिर

लड़ेगी कैसे?

लड़ेगी नहीं तो

जीतेगी कैसे?

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