कुछ मर्दों के साथ भी हिंसा होती है लेकिन …

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इसकी तुलना महिला के खिलाफ होने

वाली हिंसा से कतई नहीं की जा सकती

नासिरूद्दीन

nasir 6 july new ढाका। हिंसा वही करता है जिसके पास सत्ता की ताकत होती है। कई बार यह ताकत कुछ औरतों के पास भी होती है। फिर वे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का दायरा काफी बड़ा है। इसकी तुलना पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा से कतई नहीं की जा सकती।

क्या घरों में सिर्फ औरतें ही हिंसा की शिकार होती हैं, मर्द नहीं? ढाका में जेण्डर समानता और महिला हिंसा के खिलाफ दक्षिण एशियाई देशों के संवाद में जब ‘हिन्दुस्तान’ ने इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन के गैरी बार्कर के सामने जब यह सवाल पेश किया तो वे थोड़ा रुके। होंठ भींचा और एक-एक शब्द तौलते हुए बोलना शुरू किया। ‘कुछ पुरुष मानसिक हिंसा के शिकार होते हैं। दक्षिण एशिया में घर के अंदर कुछ महिलाओं के पास सीमित सत्ता शक्ति होती है। वे इसका इस्तेमाल कई बार मर्दों, बच्चों और ससुरालियों के साथ हिंसा के रूप में करती हैं। यही नहीं महिलाओं का सामाजीकरण ऐसा होता है कि वे भावनाओं को ज्यादा खुले तौर पर जहिर कर पाती हैं। कई बार यही पुरुषों के साथ मानसिक हिंसा की वजह होती है।’ लेकिन गैरी आगाह करते हैं, महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा की तुलना, पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा से नहीं की जा सकती। महिलाओं के साथ हिंसा काफी व्‍यापक और और कई तरह का है। उसकी जटिलताएँ काफी है। इसलिए यह मुद्दा उठाते वक्‍त काफी एहतियात बरते जाने की जरूरत है।

हिंसा के खिलाफ मर्द-5

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

नासिरूद्दीन

वहीं सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस, दिल्ली के डॉ. अभिजीत दास का कहना है ‘हिंसा चाहे जो करे गलत है। लेकिन हमें देखने होगा कि यह हिंसा कहाँ से आ रही है। क्या यह सामाजिक संरचना और विभेद की उपज है या फिर उत्पीड़न की प्रतिक्रिया है? अगर यह सामाजिक संरचना की वजह से हो रहा है यानी सत्ता स्थापित करने के लिए तो जहिर यह गंभीर मसला है। … और आमतौर पर पुरुष संरचना की वजह स्त्री की हिंसा के शिकार नहीं होते। ’ कुछ ही ऐसी राय बीस सालों से हिमाचल में समुदाय के साथ काम करने वाले सुभाष मेंढापुरकर की है।

लेकिन गैरी, सुभाष और अभिजीत जब यह कहते हैं तो साथ-साथ वे इसके खतरे से भी आगाह करते हैं। सुभाष कहते हैं कि अगर एक हजर में 999 औरतें हिंसा की शिकार हैं तो मर्द केवल एक होंगे। यही नहीं कई बार हिंसक मर्द अपने करतूत को जयज ठहराने के लिए इस तर्क का इस्तेमाल करेंगे। इसलिए यह जरूरी है कि जब हम घर में मर्दों के साथ होने वाली हिंसा की बात करें तो काफी सतर्क रहें।

वहीं, मदुरैई में काम करने वाली संस्था एकता की विमला चंदशेखर कहती हैं कि पुरुषों के साथ हिंसा होती है लेकिन पुरुष की हिंसा और औरत की हिंसा को एक तराजू पर नहीं तौला ज सकता। औरत की जिंदगी ज्यादा हिंसा के साये में रहती है। खतरे भी ज्यादा उठाने पड़ते हैं। मर्द को हर पग उठाने से पहले सोचना नहीं पड़ता।

(हिन्‍दुस्‍तान से साभार)

मन पर वार करती है हिंसा

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nasir 6 july new बच्चे-बच्चियों की खातिर हिंसा से करें तौबा

नासिरूद्दीन

ढाका। घर में होने वाली हिंसा महिलाओं-बच्चे और बच्चियों पर जबरदस्त असर डाल रही है। उनकी शख्सीयत को प्रभावित कर रही हैं। वे कैसे इन्सान बनेंगे, इस बात की बुनियाद भी इससे तय हो रही है। कई रिसर्च इस बात की तस्दीक कर रहे हैं। ढाका में आयोजित संवाद के दौरान इंटरनेशन सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन के गैरी बार्कर से जब जेण्डर आधारित हिंसा के असर के बारे में सवाल किए गए तो उन्होंने तफसील से बताया। पेश है बातचीत की निचोड़

हिंसा के खिलाफ मर्द-3

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

नासिरूद्दीन


  • महिलाओं-बच्चे-बच्चियों पर असर

  • हिंसा से डर पैदा होता है। डर उन्हें कई बार आक्रामक बनाता है।
  • बच्चों को स्कूल में परेशानी होती है। सीखने की सलाहियत कम हो जाती है। ध्यान नहीं लगा पाते।
  • बच्चे-बच्चियों में यह विचार पैदा होता है कि हिंसा सामान्य बात है। जब जरूरत पड़े तो हम भी हिंसा का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • बेइज्जती और शर्म का अहसास

  • एक तमाचा शरीर को कम ‘मन और अहम’ को ज्यादा चोट पहुँचाता है। यह चोट हिंसा को बढ़ावा देती है। यानी घाव से ज्यादा शर्म हिंसा को बढ़ावा देती है।
  • अगर कोई महिला या बच्चा लगातार हिंसा के शिकार हो रहे हैं या हिंसा के माहौल में जी रहे हैं तो उसमें डर वाले हार्मोन बढ़ जते हैं।
  • ये हार्मोन हैं- कार्टिसोल और एंड्रेलिन। इसकी जाँच खून से हो सकती है। वसे तो यह जरूरी हार्मोन हैं जो हमें खतरे से अलर्ट करते हैं। लेकिन कोई लगातार अलर्ट की हालत में रहे तो उसकी दिमागी दशा क्या होगी?
  • लड़कियों पर असर

  • यूरोप और अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि हिंसा के माहौल में परवरिश पाने वाली लड़कियाँ हिंसा को सामान्य मानकर अपना लेती हैं।
  • उनका खुद पर भरोसा खत्म हो जता है। शख्सीयत में टूटन और बिखराव पैदा होता है।
  • हिंसा से बचने के लिए मदद लेने से परहेज करती हैं।
  • डिप्रेशन, तनाव और नाउम्मीदी की शिकार हो जती हैं।
  • लड़कों पर असर

  • जहाँ ज्यादातर लड़कियों हिंसा को अंदरूनी तौर पर आत्मसात करती हैं वहीं लड़कों में इसका असर बाहरी तौर पर ज्यादा दिखाई देता है।
  • दूसरों के साथ आक्रामक व्यवहार करते हैं। बात-बात पर हिंसा का सहारा लेते हैं।
  • ऐसे लड़के बड़े होने पर अपने निजी रिश्ते में भी हिंसा का जमकर इस्तेमाल करते हैं।

  • और जो हिंसा करते हैं,क्या उनपर भी कोई असर होता है? हाँ, जो हिंसक होते हैं उनमें

  • अपराधबोध की भावना घर कर जती है।
  • कई बार शर्मिदगी का अहसास होता है।
  • सब कुछ खो जने का अहसास। हिंसा की वजह से रिश्ते में दरार और नुकसान की भावना पैदा होती है।
  • नाकामी का अहसास होता है।
  • कुछ ऐसे भी मर्द हैं जिन्हें हिंसा के बाद संतुष्टि मिलती है।
  • छोटी-छोटी बातों की अभिव्यक्ति हिंसक रूप में करते हैं।
  • काम में नुकसान और चिड़िचिड़ापन बढ़ जता है।

तो हिंसा के इतने और ऐसे-ऐसे असर! इसलिए बेहतर आज और बेहतर कल के लिए, बेहतर जिंदगी और इन्सान के लिए, बेहतर समाज और घर के लिए जेण्डर समानता पर आधारित हिंसा मुक्त माहौल बनाया जना जरूरी है।

DHAKA REPORT-3

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सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी में है हिंसा की जड़ें

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nasir 6 july new

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ। नासिरूद्दीन

हिंसा के खिलाफ मर्द-२

ढाका।सवाल है जब हिंसा प्राकृतिक नहीं है तो यह पैदा कहाँ से होती है? गैरी बार्कर ने इस पर काफी शोध किया है। बार्कर इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन, वाशिंगटन से जुड़े हैं। महिला हिंसा रोकने में मर्दो को भागीदार बनाने के जबरदस्त पैरोकार हैं। बांग्लादेश की राजधानी में आयोजित संवाद में गैरी से जब जेण्डर आधारित हिंसा के कारणों पर बातचीत हुई तो उन्होंने कई सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक वजहें गिना डालीं।

वह बात शुरू करते हैं, पितृसत्तात्मक व्यवस्था महिलाओं को कमतर बना कर रखती है। जैसे, उनके पास सम्पत्ति के हक नहीं हैं। आमदनी में भी कम हैं। यह गैरबराबरी मर्दो को शक्ति देती है। वे औरतों को काबू में करके रखते हैं। यही सत्ता शक्ति हिंसा की वजह बनती हैं। यही नहीं, वही मर्द जो घर में औरत के साथ हिंसक होता है, बाहरी दुनिया में ऐसी ही वर्गीय विभेद और गैरबराबरी के कारण खुद भी हिंसा का शिकार होता है। इसलिए मर्दो को इसे समझना चाहिए।

हिंसा की एक वजह वैश्वीकरण है, ऐसा गैरी मानते हैं। उनके मुताबिक, ‘पैदावार के पारम्परिक तरीके और पुश्तैनी पेशे खत्म हो रहे हैं। खेती से लेकर घरेलू उद्योगों तक यही हाल है। ऊपर से हमारा सामाजीकरण ऐसा है जो मर्दो को ही पैसा कमाने का जिम्मेदार बनाता है। मर्दानगी से भी इसे अटूट रूप से जोड़ा गया है। यानी जो कमाकर न लाए या घर का खर्च न उठाए वो मर्द नहीं। अब जब मर्द के पास पैसे कमाने के साधन नहीं बचे या नाकाफी हैं तो वह प्रतियोगिता में अपने को हारा हुआ मान रहा है। नतीजतन, शराबखोरी, पैसे से सेक्स खरीदना, परिवार में पत्नी और बच्चे के साथ हिंसा, एचआईवी संक्रमण और आत्महत्या जसी बुराइयाँ जड़ जमा रही हैं।’

जहाँ तक मीडिया की बात है, गैरी कहते हैं कि आज दस-दस रुपए में सीडी और डीवीडी मिल रही है। केबल है। इंटरनेट का जाल है। छवियों की भरमार है जो महिला विरोधी है। इन सबके जरिए महिला के शरीर को बिकने लायक वस्तु के रूप में पेश किया जा रहा है। यौन जिंदगी में मनमानेपन को बढ़ावा दिया जा रहा है। यही मनमानापन हिंसा को जन्म दे रहा है।

गैरी राष्ट्रवाद के उभार को भी महिला हिंसा के लिए अहम वजह के रूप में देखते हैं। बकौल गैरी, जो भी विचार कथित राष्ट्रवादियों से मेल नहीं खाता, वे उसे विदेशी बना देते हैं। वे हिन्दुत्ववादी संगठनों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मैंगलोर में लड़कियों पर हमला इसी विचार की देन है। वह महिलाओं पर तालीबान के जुल्म की याद दिलाते हैं। उनका मानना है कि यह हिन्दू धर्म और इस्लाम की लिंग भेद पर आधारित व्याख्या का नतीज है। हिंसा रोकने के लिए इसे चुनौती देना जरूरी है।

सैन्यीकरण और जंग का माहौल, घरों में हिंसा का बड़ा कारण है। गैरी के मुताबिक, युद्ध के खतरे की वजह से लाखों सैनिकों को हमेशा ‘सावधान’ रहना पड़ता है। वे सावधान या मरने-मारने को तब ही तैयार रहेंगे जब युद्ध यानी हिंसा का महिमामंडन किया जाए। उसकी शौर्यगाथाएँ गाईं जाएँ। मरने-मारने को महान काम बताए जाए। वह बताते हैं, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल सैनिकों की बीवियों के अध्ययन से पता चला है कि वे जबरदस्त हिंसा की शिकार हैं। और हिंसा होगी क्यों नहीं? यह कैसे मुमकिन है कि बाहर तो उन्हें क्रूर हिंसक बनना सीखाइए और घर में उनसे अहिंसक होने की उम्मीद की जाए!

यानी अगर गैरी की बात पर गौर करें तो अगर जेण्डर आधारित हिंसा को रोकना है तो इन वजहों पर गौर करना होगा। वरना मुमकिन नहीं की इस हिंसा को महज नारों से रोका जा सके।

मीडिया जटलिताओं को सामने लाए

गैरी बार्कर मानते हैं कि मीडिया का फैलाव मजबूत लोकतंत्र की निशानी है। लेकिन मीडिया से उनकी कुछ गुजारिश है। वह कहते हैं कि मीडिया हमें ज्यादातर हिंसा की पीड़ित और हिंसक व्यक्ति की दास्तान ही बताता है। वह इसे दो व्यक्तियों के टकराव के रूप में ही पेश करता है। इससे उबरने की जरूरत है। उनकी सलाह है कि मीडिया हिंसा की जटलिताओं को सामने लेकर आए।

(’हिन्‍दुस्‍तान’ से साभार)

राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए

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asghar ali by Nasiruddin

इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’ के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत की अब तीन हिस्‍से आप पढ़ चुके हैं। पहला हिस्‍से का शीर्षक धर्म की प्रासंगिकता-1, दूसरे का शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए और तीसरे हिस्‍से का शीर्षक कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे था। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। चौथा और अंतिम हिस्‍सा पेश है-

इस्लाम में जिन समस्याओं का सीधा जवाब कुरान या हदीस में नहीं मिलता, उसके लिए इज्तेहाद यानी जमाने के हिसाब से इस्लाम के उसूलों की रोशनी में विचार-विमर्श कर मसले का हल तय करने की परम्परा रही है। हालांकि यह प्रक्रिया आज के दौर में बिल्कुल बंद हो गयी है। इसकी क्या वजह है?

इसकी वजह सीधी है। उलमा अपना एकाधिकार खत्म नहीं करना चाहते हैं। वे एक पिछड़े समाज की पैदावार हैं। मदरसों में उनकी तालीम भी पुराने कद्रों के मुताबिक होती है। जब तक मदरसों की तालीम का निज़ाम नहीं बदलेगा, तब तक यह समस्या रहेगी। दूसरी दिक्कत यह है कि भारतीय मुसलमानों का एक बड़ा तबका कम पढ़ा लिखा या अनपढ़ है, वो इन उलमा की हर बात को सच मानकर यकीन कर लेता है। वक्त के साथ इसे बदलना होगा क्योंकि बिना इज्तेहाद के आगे बढ़ना मुश्किल है।

समाज और जिंदगी में धर्म के दखल़ को लेकर काफी बहस रही है। इस्लाम एक ऐसा मज़हब रहा है जिसका शुरू से ही राजनीतिक, सामाजिक और लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी में दखल रहा है। हिन्दुस्तान जैसे मुल्क में मज़हब का दखल किस रूप में और किस हद तक होना चाहिए?

जहां इस्लाम ने शुरुआती परवरिश पायी, उस रेगिस्तान में कोई लिखा हुआ कायदा-कानून नहीं था। उस वक्त राज्य का कोई विचार नहीं था। इसलिए इस्लाम जब आया तो राष्‍ट्र/राज्य बने और इसे चलाने के लिए इस्लाम की ही रोशनी में कानून बने। इसके लिए कुरान व हदीस का सहारा लिया गया। इसलिए हर जगह उनका दखल मुमकिन था।

लेकिन आज की तारीख में राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। इस्लामी देशों में भी नहीं। राजनीति का काम लोगों की परेशानियों को जाति, धर्म, और कोई अन्य पहचान देखे बिना सुलझाने का है। आज नागरिकता की अवधारणा का जमाना है। नागरिक का कोई भी मजहब हो सकता है, पर राज्य का नहीं। यह उसूल बुनियादी है। अब मज़हब के आधार पर एक को, दूसरे पर बरतरी नहीं दी जा सकती और यह बात कुरान के उसूलों से नहीं टकराती।

लेकिन आज की तारीख में राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। इस्लामी देशों में भी नहीं। राजनीति का काम लोगों की परेशानियों को जाति, धर्म, और कोई अन्य पहचान देखे बिना सुलझाने का है। आज नागरिकता की अवधारणा का जमाना है। नागरिक का कोई भी मजहब हो सकता है, पर राज्य का नहीं। यह उसूल बुनियादी है। अब मज़हब के आधार पर एक को, दूसरे पर बरतरी नहीं दी जा सकती और यह बात कुरान के उसूलों से नहीं टकराती।

उस मध्ययुगीन समाज में भी जहां सिटीजन यानी नागरिक की अवधारणा नहीं थी, कुरान ने ‘अहले जिम्मा’ की अवधारणा पेश की। यानी जो लोग मुसलमान नहीं हैं, उनके जान और माल की मुसलमान और इस्लामिक राज्य हिफ़ाज़त करेगी। यही नहीं उनका किसी तरह का उत्पीड़न नहीं होगा। गैर मुस्लिमों की हिफ़ाज़त, शर्तिया नहीं होगी। गैर मशरूत यानी, बिना किसी शर्त के होगी।

आज के दौर में थोड़ा इससे आगे जाना होगा। मुसलमान और गैर मुसलमान का कोई फर्क नहीं रहेगा और सबको बराबर राजनीतिक अधिकार मिलेंगे। ‘अहले जिम्मा’ के वर्गीकरण की यह रचनात्मक व्याख्या होगी। यह काम हमारे हिन्दुस्तानी उलमा ने किया है। मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कम्पोजिट ने नेशनलिज्म (मिलजुले राष्‍ट्रवाद) को माना। इसी बुनियादी पर इन उलमा ने द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत की मुखालफत की। इन सबका मानना था कि पाकिस्तान की मांग राजनीतिक है, न कि मज़हबी।

यह कुरान और सुन्नत-ए-नबवी के मुताबिक होगा कि हम ‘कम्पोजिट नेशनलिज्म` को माने। इसके तहत सभी नागरिक को समान हक मिले। यहां आस्था, निहायत निजी मामला होगा। जम्हूरियत की खूबी है कि नागरिक बिना किसी डर के अपने मज़हब को मानने को आज़ाद होगा।

लोगों की जिंदगी में मजहब का कहां तक दखल हो?

निजी कानून का मसला, माअमलात के तहत आता है। इसे बदलना होगा। निकाह या शादी कैसे होगी, इसमें राज्य का दखल नहीं होगा लेकिन जहां तक जेण्डर समानता की बात है, राज्य को इसके लिए दखल देना होगा। जैसे नाबालिग की शादी का मसला है- कोई यह नहीं कह सकता है कि यह हमारी आस्था का मामला है कि हम 18 साल से कम उम्र की लड़की से भी शादी करेंगे। इसमें राज्य को दखल देना होगा। कई उलमा बीवी को पीटने की बात को जायज ठहराते हैं। यह माअमलात का मसला है, इसे रोकने के लिए भी राज्य को आगे आना होगा।

इस इंटरव्यू की पहली तीन कडि़यां

धर्म की प्रासंगिकता-1

शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे

पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com

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कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे

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सुन्नी इस्लाम में शरीअत के चार स्रोत हैं-कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कियास यानी जब कोई चीज कुरान या हदीस में नहीं मिलती तो आप उस तरह के हालात के आधार पर समस्याओं का हल तलाशते हैं। जब यह काम हो गया तो इस हल के लिए आप आम सहमति पैदा करना चाहते हैं ताकि सब उसे स्वीकार कर लें। इसमें सिर्फ कुरान खुदाई है। हदीस, इज्मा और कियास मानव निर्मित है।

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इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत का पहला हिस्‍सा धर्म की प्रासंगिकता-1 और दूसरा हिस्‍सा शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए थी। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। तीसरा हिस्‍सा पेश है-

शरीअत क्या है? क्या इसमें बदलाव सम्भव है?
शरीअत, कुरान और हदीस पर आधारित है। लेकिन इसमें मानवीय व्याख्या भी शामिल है। कौन सी हदीस मानेंगे या नहीं मानेंगे, यह भी आदमी के फैसले पर निर्भर है। यहाँ तक कि कुरान की समझ भी मानवीय निर्णय पर आधारित है। शरीअत को पूरी तरह डिवाइन (खुदाई) या अपरिवर्तनीय मानना सही नहीं है। शरीअत कुछ डिवाइन स्रोत पर आधारित है लेकिन उस डिवाइन स्रोत की समझ, मानवीय है। जिस हद तक वह मानवीय है, उसे बदला जा सकता है।

हदीस के सोर्स पर सवाल उठाया जा सकता है या नहीं?
क्यों नहीं उठा सकते। सारे मसलक अलग-अलग इसीलिए हुए कि अलग-अलग मसलक के लोग अलग-अलग हदीसें इस्तेमाल करते हैं। जैसे अहले हदीस हैं, वो तीन तलाक को नहीं मानते। हदीस के हवाले से ही नहीं मानते हैं। दूसरे मसलक मानते हैं, वो भी हदीस के हवाले से मानते हैं… तो हदीस का मसला विवादास्पद है। मुसलमानों में एक मसलक ऐसा भी है, जो हदीस को पूरी तरह नकारता है। यह अहले कुरान कहलाते हैं। यह भी सचाई है कि रसूल ने मना किया था कि हदीसें मत जमा करो, कल तुम इस पर लड़ोगे। हजरत अबु बक्र ने मना किया, हदीसें जमा मत करो। हजरत उमर के जमाने में ढाई-तीन साल तक हदीसों को स्वीकार नहीं किया जा रहा था।
फिर शियों की हदीस अलग है। सुन्नियों की हदीस अलग है। बरेलवियों की अलग है। तो आप क्या करेंगे। आप फिर यह कैसे कहेंगे कि शरीअत खुदाई है। यहीं साबित हो जाता है कि शरीअत का बड़ा हिस्‍सा मानव निर्मित है। अगर आदमी ने शरीअत बनाया है तो उसे बदलना चाहिए।
उस दौर में पैगम्बर से कई सवाल पूछे जाते थे, उसका वो जवाब देते थे। यह जवाब एक-दूसरे से आगे बढ़ी। वो ही हदीस है। जब शरीअत लॉ का संग्रह किया जा रहा था, तो हदीसों का सहारा लिया गया।
सुन्नी इस्लाम में शरीअत के चार स्रोत हैं-कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कियास यानी जब कोई चीज कुरान या हदीस में नहीं मिलती तो आप उस तरह के हालात के आधार पर समस्याओं का हल तलाशते हैं। जब यह काम हो गया तो इस हल के लिए आप आम सहमति पैदा करना चाहते हैं ताकि सब उसे स्वीकार कर लें। इसमें सिर्फ कुरान खुदाई है। हदीस, इज्मा और कियास मानव निर्मित है।

जब इतना हिस्सा शरीअत का मानव निर्मित है, तो उसमें बदलाव करना चाहिए। जैसे चार शादी का मसला है। कुरान ने कहीं नहीं कहा कि चार शादी करो, बल्कि सावधान किया कि मत करो। क्यों, क्योंकि तुमसे इंसाफ नहीं होगा। नामुमकिन है सभी बीवियों से इंसाफ करना। इस पर कई हदीसें हैं। हदीसें इस्तेमाल कर-कर के इसे जायज बना लिया गया। इसीलिए शरीअत का कुछ हिस्सा खुदाई है तो कुछ हिस्सा मानव निर्मित। तो उस हद तक तो बदलाव होना चाहिए।
कुरान जो मूल्य देता है, वह स्थाई है। बहुत सारी चीजें कुरान में संदर्भ के साथ, उस समय के हालात के मुताबिक है। जैसे-दासता। उस वकत दास रखने की इजाजत देनी पड़ी क्योंकि हालात ऐसे थे लेकिन संकेत दे दिया कि यह होना नहीं चाहिए। हालांकि आज भी ऐसे उलमा हैं जो कहते हैं कि हमें हक है गुलाम रखने का। वो बेइमानी करते हैं, कुरान के साथ। उन चीजों को उठा लेते हैं, जहाँ गुलाम रखने की इजाजत है। उस चीज को छिपा लेते हैं, जहाँ इसे मानवीय सम्मान के खिलाफ बताया गया है। यह चयनित नजरिया है। अगर मैं पुरातनपंथी हूँ तो ऐसी ही चीजें चुनूँगा कुरान या गीता से, जो मेरे नजरिये के मुताबिक हो और उसे मजबूत करे। बाकि को मैं छिपा जाता हूँ। इसीलिए जब तक पूर्णता में कोई बात नहीं होगी तो दिक्कत होगी।

मैं कुरान की आयतों को दो हिस्सों में बाँटता हूँ- नार्मेटिव (आदर्शमूलक) और कांटेक्सट्य़ूअल (सन्दर्भगत)। जो चीजें उस वक्त के खास सन्दर्भ में आईं थीं यानी कांटेक्सट्य़ूअल आज लागू नहीं होंगी। जो आदर्श है, वह आज भी लागू होगी। कुरान में जितने मूल्य हैं, वह सब नार्मेटिव हैं। कुरान में इंसाफ एक नार्म है, बहुविवाह एक कांटेक्सट है। सो नार्म विल प्रिवेल ओवर कांटेक्सट।

मैं कुरान की आयतों को दो हिस्सों में बाँटता हूँ- नार्मेटिव (आदर्शमूलक) और कांटेक्सट्य़ूअल (सन्दर्भगत)। जो चीजें उस वक्त के खास सन्दर्भ में आईं थीं यानी कांटेक्सट्य़ूअल आज लागू नहीं होंगी। जो आदर्श है, वह आज भी लागू होगी। कुरान में जितने मूल्य हैं, वह सब नार्मेटिव हैं। कुरान में इंसाफ एक नार्म है, बहुविवाह एक कांटेक्सट है। सो नार्म विल प्रिवेल ओवर कांटेक्सट।
उस कांटेक्सट में बहुविवाह की इजाजत दी गयी लेकिन आदर्श की बरतरी बताते हुए कि ‘जस्टिस इज मोर फंडामेंटल दैन पॉलिगेमी`। मुसलमानों ने बहुविवाह को अहम बना लिया और इंसाफ को छोड़ दिया। मेरी सारी लड़ाई यही है कि ‘जस्टिस इज फंडामेंटल नॉट पॉलिगेमी।` इंसाफ नहीं होता है तो बहुविवाह की इजाजत नहीं हो सकती। इसलिए मूल्य स्थाई रहेंगे और क्वानीन बदलते रहेंगे क्योंकि एक समाज में उन्हीं मूल्यों के आधार पर एक तरह के कानून बनेंगे तो किसी और समाज में उन्हीं मूल्यों के आधार पर दूसरे कानून। इसीलिए लॉ कभी भी स्थाई नहीं हो सकता। वही बात शरीअत पर भी लागू होती है। कुरान के मूल्य कभी नहीं बदलेंगे। लेकिन उन मूल्यों के आधार पर बने कानून बदलते रहेंगे।

इकबाल अपने रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रीलिजियस थॉट इन इस्लाम` में बहुत साफ कहा है कि मुसलमानों की हर पीढ़ी को शरीअत के बारे में पुनर्विचार का अधिकार होना चाहिए। और शरीअत लॉ में बदलाव होना चाहिए। वह उसी समझ के तहत यह बात कह रहे थे कि सामाजिक जरूरत बदलती है। तुर्की में जो उस वक्त हो रहा था, उसका उन्होंने स्वागत किया। कमाल पाशा जो बदलाव ला रहे थे, वो उसकी काफी प्रशंसा कर रहे थे। उन्होंने कहा, जो काम पहले उलमा करते थे, उसे अब पार्लियामेंट को करना होगा। निर्वाचित प्रतिनिधि को करना होगा। वो लोग सामाजिक जरूरत के हिसाब से बदलाव के लिए आम सहमति पैदा करने का काम करेंगे। लेकिन उलमा इसे कभी तस्लीम नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनकी लीडरशीप जाती है। एक मसला लीडरशीप का भी है। सारे मसलक के नेता जो आपस में लड़ते हैं, वो वास्तव में सत्ता की लड़ाई है। चाँद के मसले पर भी जो होता है, वह यही है।

फतवों को आप किस रूप में देखते हैं?
मौलाना फतवे अपने-अपने मसलक (पंथ) के हिसाब से देते हैं। ससुर के बलात्कार की पीड़ित इमराना ने अपने बारे में दिये गये फतवे को नहीं माना। आज भी वह अपने शौहर के साथ रह रही है। शौहर ने भी नहीं माना उस फतवे को। अपनी बीवी को नहीं छोड़ा उसने। इसीसे से हम समझ सकते हैं कि फतवा कितना बाध्यकारी है। फतवा महज एक राय है, जो किसी आलिम द्वारा किसी खास मसले पर दिया जाता है। कोई माने न माने, यह उसकी आजादी का सवाल है। इसीलिए कहा जाता है कि इस्लाम में प्रीस्टहूड नहीं है। कोई यह नहीं कह सकता कि फतवा मानना ही पड़ेगा। (जारी…)

इसके पहले की कडि़यां

धर्म की प्रासंगिकता-1

शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com

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शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

इंटरव्यू, इस्‍लाम Islam, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 2 Comments »

Engineer 1 इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत का पहला हिस्‍सा धर्म की प्रासंगिकता-1 थी। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। दूसरा हिस्‍सा पेश है-

मगर इंजीनियर साहब, मज़हब में तो इसके अलावा भी कई चीज़ें आती हैं जिनमें हम गैर बराबरी के भी विचार पाते हैं।
यह इसलिए कि परम्परा को धर्म का हिस्सा समझ लिया जाता है। यह सोच सही नहीं है। मेरी आस्था, मज़हब और उसके दिये हुए मूल्यों में है। परम्परा तो बदलने वाली चीज़ है, वह बदलती रहती है। यानी इस्लाम के संदर्भ में देखें तो दीन और शरीअत में फर्क है। दीन नहीं बदल सकता लेकिन शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए। शरीअत जड़ नहीं हो सकता। इस्लाम की जो भी परेशानियां आप देखते हैं, जैसे- हाल के दिनों में आये कई फतवे या औरतों के बारे में राय, वो सब शरीअत के नहीं बदलने की देन है। शरीअत गैर बराबरी की बात करता है पर यह गैर बराबरी कुरान के मूल्यों का हिस्सा नहीं है।

यह बात आप कैसे कह रहे हैं?
इस्लाम मध्ययुगीन सभ्यता/समाज में आया। उस वक्त कुरान के मूल्यों को मध्यकाल के नैतिक मूल्यों और मान्यताओं के तहत समझा गया। उस युग के प्रभाव के तहत ही कायदे कानून बनाये गये, वो उस वक्त के हिसाब से बेहतर था। कुरान की व्याख्या भी उसी रोशनी में हुई।
मैं मानता हूँ कि आज के दौर के मूल्य हैं -मानवीय सम्मान, मानवाधिकार, जेण्डर समानता, नागरिकता का विचार, समान अधिकार आदि कुरान की रोशनी में आज इन्हें बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इन मूल्यों को मध्ययुगीन सभ्यता में नहीं समझा जा सकता था।

चौदह सौ साल पहले एक खास सभ्यता, समाज और खास इलाके में एक मज़हब अस्तित्व में आता है। उस मज़हब के उसूल में आज के दौर के सवालों के जवाब तलाशना कहां की अक्लमंदी है?
यह समझना जरूरी है कि क्या बदल सकता है। मूल्य, कभी नहीं बदल सकते। सिद्धांत भी कभी नहीं बदल सकता। कुरान जो मूल्य देता है, वह स्थाई है। बहुत सारी चीजें कुरान में संदर्भ के साथ, उस समय के हालात के मुताबिक हैं। इसीलिए इस्लामी विद्वानों के बीच नासिख और मंसूख की भी बहस रही है। नासिख यानी जो किसी चीज को स्थगित करेगी और मंसूख, जिसे स्थगित किया जायेगा। यानी कुरान की कौन सी आयत, किस को, मूल्य के हिसाब से स्थगित करे, इस पर विचार होना चाहिए। हिन्दुस्तान में महान इस्लामी दार्शनिक शाह वलीउल्लाह ने इस पर बड़ी बहस की है। हमारे आज के उलमा इस उसूल को समझने को तैयार नहीं है।
हदीसों को लेकर भी परेशानी पैदा होती है। गैर अरब संस्कृति, जैसे- परिशयन, रोमन, कॉप्टिक संस्कृतियों में जब इस्लाम फैला तो नये मसले पैदा हुए। उलमा ने उन मसलों को उन्हीं संस्कृति की रोशनी में हल किया। हल करने की इसी कोशिश के दौरान हदीस की जरूरत पैदा हुई। जहां मुनासिब हदीस नहीं मिली, वहां नयी हदीस बनायी गयी। हदीस के अम्बार पैदा हो गये। फिर इन्हीं हदीसों की रोशनी में कानून बने। यही नहीं, जहां हदीस, कुरान की रूह के खिलाफ थी, उसे भी इस्तेमाल कर लिया गया। चूंकि उन्हें उस वक्त ऐसे ही हदीसों की जरूरत थी।

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं।
सारे शरई क्वानीन, इन हदीसों की रोशनी में बनाये गये। इसीलिए मैं कहता हूँ कि शरीअत में तब्दीली की जरूरत है जबकि कुरान के मूल्य हमेशा कायम रहेंगे। शरीअत में बदलाव होते रहे तो आज की समस्याओं का हल कुरान के मुताबिक मुमकिन है। जब हदीस को जड़ बना देंगे तो समस्या बनी रहेगी।
शरीअत के भी दो हिस्से हैं। पहला, इबादात और दूसरा, मुआमलात। इबादात में नमाज़, रोज़ा, हज, जकात आदि आते हैं। यानी इबादात, एक शख्स और उसके खुदा के बीच का रिश्‍ता है। मुआमलात यानी दो व्यक्तियों के बीच का रिश्‍ता। जैसे- शादी-ब्याह, तलाक, उत्तराधिकार, इंसानी हुकूक आदि। इबादात में बदलाव नहीं होना चाहिए। मुआमलात में बदलाव किये जा सकते हैं और किये जाने चाहिए। इसमें अगर बदलाव नहीं हुए तो परेशानी पैदा होगी। (जारी…)

इसे भी पढ़ें

पहला हिस्‍सा - धर्म की प्रासंगिकता-1

(पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com)

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मजहब की प्रासंगिकता-1

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”आस्था जब अंधविश्वास का रूप ले लेती है, तब परेशानी होती है। मुझे वह फेथ स्वीकार नहीं, जो आँख बंद कर चीज़ों के यकीन करने की बात करता है। आस्था के लिए आजादी जरूरी है। मेरा मानना है कि मुझे मुसलमान या हिन्दू सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि मैं किसी खास मज़हब मानने वालों के घर में पैदा हुआ। मुझे आज़ादी होनी चाहिए कि मैं अपने मज़हब के बारे में फैसला ले सकूँ।”

ये विचार इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर के हैं। इस्लाम को वैज्ञानिक नजरिये से देखने, मुसलमान औरतों के हक में मजबूती से आवाज उठाने के कारण इंजीनियर साहब की एक खास पहचान है। उन्होंने इस्लाम में औरतों के हक से जुड़ी कई किताबें भी लिखीं हैं। अपने विचारों के कारण अक्सर उन्हें कट्टरपंथी जमात के हमलों का भी शिकार होना पड़ता है। पेश है नासिरूद्दीन की उनसे बातचीत के प्रमुख अंश। यह बातचीत अन्यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है।

जहां हर चीज़ वैज्ञानिक तर्क और कसौटी पर कसी जा रही हो, उस दौर में मज़हब की क्या प्रासंगिकता हैं?

देखिये, यह इस बात पर निर्भर है कि आप मज़हब को किस तरह से लेते हैं। मेरी नज़र में धर्म की प्रासंगिकता हमेशा रहेगी। कोई जमाना ऐसा नहीं रहेगा जिसमें धर्म अपनी भूमिका खो देगा। मैं रेश्नलिस्ट (बुद्धिवादी) की इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि अक्ल और आस्था (फेथ) एक-दूसरे के मुखा़लिफ़ हैं। न सिर्फ फेथ से काम चल सकता है और न ही सिर्फ अक्ल से। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी। ये जिंदगी के दो पहियों की तरह हैं।
आस्था जब अंधविश्वास का रूप ले लेती है, तब परेशानी होती है। मुझे वह फेथ स्वीकार नहीं, जो आंख बंद कर चीज़ों के यकीन करने की बात करता है। आस्था के लिए आजादी जरूरी है। मेरा मानना है कि मुझे मुसलमान या हिन्दू सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि मैं किसी खास मज़हब मानने वालों के घर में पैदा हुआ। मुझे आज़ादी होनी चाहिए कि मैं अपने मज़हब के बारे में फैसला ले सकूँ। मेरी नजर में सिर्फ अक्ल, स्केपटिसिज्म यानी सं यवाद की ओर ले जा सकता है जबकि किसी काम करने की ओर आस्था ही प्रेरित कर सकती है। मेरे लिए मज़हब का मतलब सह्रदयता, प्यार, सच्चाई, मानवीय सम्मान की हिफाजत है। आस्था मुझे सही दिशा में काम करने को प्रेरित करता है।
रेशनल, अक्ल को असीमित मान लेते हैं। इन दोनों का दायरा अलग-अलग है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि बतायें कि खुदा कहां हैं? यह रेशनल होने का सतही तरीका है। आस्था, रेशनल का विरोधी नहीं बल्कि रेशनल के आगे की चीज है। अक्ल हर जगह नहीं पहुंच सकती। एक औरत से किसी मर्द को जबरदस्त मोहब्बत हो जाती है और किसी मर्द को उससे कोई आकर्षण नहीं होता। अब आप मोहब्बत करने वाले से यह कहें कि अक्ल से साबित करो कि तुम्हें क्यों मोहब्बत है़… वैज्ञानिक सुबूत लेकर आओ कितनी मोहब्बत है, तो यह मुमकिन नहीं है। अक्ल और आस्था, अक्सर टकराते हैं लेकिन अगर आस्था को हम अंधा बना लें, तो यह हमारी गलती है।

लेकिन मज़हब तो कट्टरता की ओर ले जाता है।
मैं इस संदर्भ में कहना चाहता हूँ कि धर्मान्धता या कट्टरता किसी मज़हब का खास गुण नहीं है। यह किसी शख्स की मनोवैज्ञानिक हालत का नतीजा है। हम मज़हब को कट्टर या धर्मान्धता की वजह कैसे कह सकते है जबकि हमारे पास पंडित सुंदरलाल और मौलाना अबुल कलाम आजाद का उदाहरण मौजूद है। दोनों धार्मिक थे लेकिन धर्मान्ध नहीं। रेशनलिस्ट की दिक्कत है कि वे धर्मान्धता को मज़हब का खास गुण मानते हैं।
एक और बात। जहां तक विज्ञान की बात है, विज्ञान सिर्फ तथ्यात्मक सुबूत देखता है जबकि आस्था नैतिक, आत्मिक विचार। विज्ञान, नैतिक और आत्मिक मूल्यों से निरपेक्ष रहता है। इसलिए मेरे लिए विज्ञान के साथ ही मज़हब की आस्था भी अहम है।

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