… और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा (Declining sex ratio among the Muslims-1)

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Sana by Nasiruddin

और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’

(कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)

यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है। …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्‍यादातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है। … यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है। 

आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं। सचाई भी है। लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़। (आगे पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें) Read the rest of this entry »

राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए

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asghar ali by Nasiruddin

इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’ के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत की अब तीन हिस्‍से आप पढ़ चुके हैं। पहला हिस्‍से का शीर्षक धर्म की प्रासंगिकता-1, दूसरे का शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए और तीसरे हिस्‍से का शीर्षक कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे था। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। चौथा और अंतिम हिस्‍सा पेश है-

इस्लाम में जिन समस्याओं का सीधा जवाब कुरान या हदीस में नहीं मिलता, उसके लिए इज्तेहाद यानी जमाने के हिसाब से इस्लाम के उसूलों की रोशनी में विचार-विमर्श कर मसले का हल तय करने की परम्परा रही है। हालांकि यह प्रक्रिया आज के दौर में बिल्कुल बंद हो गयी है। इसकी क्या वजह है?

इसकी वजह सीधी है। उलमा अपना एकाधिकार खत्म नहीं करना चाहते हैं। वे एक पिछड़े समाज की पैदावार हैं। मदरसों में उनकी तालीम भी पुराने कद्रों के मुताबिक होती है। जब तक मदरसों की तालीम का निज़ाम नहीं बदलेगा, तब तक यह समस्या रहेगी। दूसरी दिक्कत यह है कि भारतीय मुसलमानों का एक बड़ा तबका कम पढ़ा लिखा या अनपढ़ है, वो इन उलमा की हर बात को सच मानकर यकीन कर लेता है। वक्त के साथ इसे बदलना होगा क्योंकि बिना इज्तेहाद के आगे बढ़ना मुश्किल है।

समाज और जिंदगी में धर्म के दखल़ को लेकर काफी बहस रही है। इस्लाम एक ऐसा मज़हब रहा है जिसका शुरू से ही राजनीतिक, सामाजिक और लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी में दखल रहा है। हिन्दुस्तान जैसे मुल्क में मज़हब का दखल किस रूप में और किस हद तक होना चाहिए?

जहां इस्लाम ने शुरुआती परवरिश पायी, उस रेगिस्तान में कोई लिखा हुआ कायदा-कानून नहीं था। उस वक्त राज्य का कोई विचार नहीं था। इसलिए इस्लाम जब आया तो राष्‍ट्र/राज्य बने और इसे चलाने के लिए इस्लाम की ही रोशनी में कानून बने। इसके लिए कुरान व हदीस का सहारा लिया गया। इसलिए हर जगह उनका दखल मुमकिन था।

लेकिन आज की तारीख में राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। इस्लामी देशों में भी नहीं। राजनीति का काम लोगों की परेशानियों को जाति, धर्म, और कोई अन्य पहचान देखे बिना सुलझाने का है। आज नागरिकता की अवधारणा का जमाना है। नागरिक का कोई भी मजहब हो सकता है, पर राज्य का नहीं। यह उसूल बुनियादी है। अब मज़हब के आधार पर एक को, दूसरे पर बरतरी नहीं दी जा सकती और यह बात कुरान के उसूलों से नहीं टकराती।

लेकिन आज की तारीख में राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। इस्लामी देशों में भी नहीं। राजनीति का काम लोगों की परेशानियों को जाति, धर्म, और कोई अन्य पहचान देखे बिना सुलझाने का है। आज नागरिकता की अवधारणा का जमाना है। नागरिक का कोई भी मजहब हो सकता है, पर राज्य का नहीं। यह उसूल बुनियादी है। अब मज़हब के आधार पर एक को, दूसरे पर बरतरी नहीं दी जा सकती और यह बात कुरान के उसूलों से नहीं टकराती।

उस मध्ययुगीन समाज में भी जहां सिटीजन यानी नागरिक की अवधारणा नहीं थी, कुरान ने ‘अहले जिम्मा’ की अवधारणा पेश की। यानी जो लोग मुसलमान नहीं हैं, उनके जान और माल की मुसलमान और इस्लामिक राज्य हिफ़ाज़त करेगी। यही नहीं उनका किसी तरह का उत्पीड़न नहीं होगा। गैर मुस्लिमों की हिफ़ाज़त, शर्तिया नहीं होगी। गैर मशरूत यानी, बिना किसी शर्त के होगी।

आज के दौर में थोड़ा इससे आगे जाना होगा। मुसलमान और गैर मुसलमान का कोई फर्क नहीं रहेगा और सबको बराबर राजनीतिक अधिकार मिलेंगे। ‘अहले जिम्मा’ के वर्गीकरण की यह रचनात्मक व्याख्या होगी। यह काम हमारे हिन्दुस्तानी उलमा ने किया है। मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कम्पोजिट ने नेशनलिज्म (मिलजुले राष्‍ट्रवाद) को माना। इसी बुनियादी पर इन उलमा ने द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत की मुखालफत की। इन सबका मानना था कि पाकिस्तान की मांग राजनीतिक है, न कि मज़हबी।

यह कुरान और सुन्नत-ए-नबवी के मुताबिक होगा कि हम ‘कम्पोजिट नेशनलिज्म` को माने। इसके तहत सभी नागरिक को समान हक मिले। यहां आस्था, निहायत निजी मामला होगा। जम्हूरियत की खूबी है कि नागरिक बिना किसी डर के अपने मज़हब को मानने को आज़ाद होगा।

लोगों की जिंदगी में मजहब का कहां तक दखल हो?

निजी कानून का मसला, माअमलात के तहत आता है। इसे बदलना होगा। निकाह या शादी कैसे होगी, इसमें राज्य का दखल नहीं होगा लेकिन जहां तक जेण्डर समानता की बात है, राज्य को इसके लिए दखल देना होगा। जैसे नाबालिग की शादी का मसला है- कोई यह नहीं कह सकता है कि यह हमारी आस्था का मामला है कि हम 18 साल से कम उम्र की लड़की से भी शादी करेंगे। इसमें राज्य को दखल देना होगा। कई उलमा बीवी को पीटने की बात को जायज ठहराते हैं। यह माअमलात का मसला है, इसे रोकने के लिए भी राज्य को आगे आना होगा।

इस इंटरव्यू की पहली तीन कडि़यां

धर्म की प्रासंगिकता-1

शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे

पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com

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कुरान के मूल्‍य नहीं पर कानून बदलेंगे

इंटरव्यू, इस्‍लाम Islam, नासिरूद्दीन Nasiruddin 7 Comments »

सुन्नी इस्लाम में शरीअत के चार स्रोत हैं-कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कियास यानी जब कोई चीज कुरान या हदीस में नहीं मिलती तो आप उस तरह के हालात के आधार पर समस्याओं का हल तलाशते हैं। जब यह काम हो गया तो इस हल के लिए आप आम सहमति पैदा करना चाहते हैं ताकि सब उसे स्वीकार कर लें। इसमें सिर्फ कुरान खुदाई है। हदीस, इज्मा और कियास मानव निर्मित है।

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इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत का पहला हिस्‍सा धर्म की प्रासंगिकता-1 और दूसरा हिस्‍सा शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए थी। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। तीसरा हिस्‍सा पेश है-

शरीअत क्या है? क्या इसमें बदलाव सम्भव है?
शरीअत, कुरान और हदीस पर आधारित है। लेकिन इसमें मानवीय व्याख्या भी शामिल है। कौन सी हदीस मानेंगे या नहीं मानेंगे, यह भी आदमी के फैसले पर निर्भर है। यहाँ तक कि कुरान की समझ भी मानवीय निर्णय पर आधारित है। शरीअत को पूरी तरह डिवाइन (खुदाई) या अपरिवर्तनीय मानना सही नहीं है। शरीअत कुछ डिवाइन स्रोत पर आधारित है लेकिन उस डिवाइन स्रोत की समझ, मानवीय है। जिस हद तक वह मानवीय है, उसे बदला जा सकता है।

हदीस के सोर्स पर सवाल उठाया जा सकता है या नहीं?
क्यों नहीं उठा सकते। सारे मसलक अलग-अलग इसीलिए हुए कि अलग-अलग मसलक के लोग अलग-अलग हदीसें इस्तेमाल करते हैं। जैसे अहले हदीस हैं, वो तीन तलाक को नहीं मानते। हदीस के हवाले से ही नहीं मानते हैं। दूसरे मसलक मानते हैं, वो भी हदीस के हवाले से मानते हैं… तो हदीस का मसला विवादास्पद है। मुसलमानों में एक मसलक ऐसा भी है, जो हदीस को पूरी तरह नकारता है। यह अहले कुरान कहलाते हैं। यह भी सचाई है कि रसूल ने मना किया था कि हदीसें मत जमा करो, कल तुम इस पर लड़ोगे। हजरत अबु बक्र ने मना किया, हदीसें जमा मत करो। हजरत उमर के जमाने में ढाई-तीन साल तक हदीसों को स्वीकार नहीं किया जा रहा था।
फिर शियों की हदीस अलग है। सुन्नियों की हदीस अलग है। बरेलवियों की अलग है। तो आप क्या करेंगे। आप फिर यह कैसे कहेंगे कि शरीअत खुदाई है। यहीं साबित हो जाता है कि शरीअत का बड़ा हिस्‍सा मानव निर्मित है। अगर आदमी ने शरीअत बनाया है तो उसे बदलना चाहिए।
उस दौर में पैगम्बर से कई सवाल पूछे जाते थे, उसका वो जवाब देते थे। यह जवाब एक-दूसरे से आगे बढ़ी। वो ही हदीस है। जब शरीअत लॉ का संग्रह किया जा रहा था, तो हदीसों का सहारा लिया गया।
सुन्नी इस्लाम में शरीअत के चार स्रोत हैं-कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कियास यानी जब कोई चीज कुरान या हदीस में नहीं मिलती तो आप उस तरह के हालात के आधार पर समस्याओं का हल तलाशते हैं। जब यह काम हो गया तो इस हल के लिए आप आम सहमति पैदा करना चाहते हैं ताकि सब उसे स्वीकार कर लें। इसमें सिर्फ कुरान खुदाई है। हदीस, इज्मा और कियास मानव निर्मित है।

जब इतना हिस्सा शरीअत का मानव निर्मित है, तो उसमें बदलाव करना चाहिए। जैसे चार शादी का मसला है। कुरान ने कहीं नहीं कहा कि चार शादी करो, बल्कि सावधान किया कि मत करो। क्यों, क्योंकि तुमसे इंसाफ नहीं होगा। नामुमकिन है सभी बीवियों से इंसाफ करना। इस पर कई हदीसें हैं। हदीसें इस्तेमाल कर-कर के इसे जायज बना लिया गया। इसीलिए शरीअत का कुछ हिस्सा खुदाई है तो कुछ हिस्सा मानव निर्मित। तो उस हद तक तो बदलाव होना चाहिए।
कुरान जो मूल्य देता है, वह स्थाई है। बहुत सारी चीजें कुरान में संदर्भ के साथ, उस समय के हालात के मुताबिक है। जैसे-दासता। उस वकत दास रखने की इजाजत देनी पड़ी क्योंकि हालात ऐसे थे लेकिन संकेत दे दिया कि यह होना नहीं चाहिए। हालांकि आज भी ऐसे उलमा हैं जो कहते हैं कि हमें हक है गुलाम रखने का। वो बेइमानी करते हैं, कुरान के साथ। उन चीजों को उठा लेते हैं, जहाँ गुलाम रखने की इजाजत है। उस चीज को छिपा लेते हैं, जहाँ इसे मानवीय सम्मान के खिलाफ बताया गया है। यह चयनित नजरिया है। अगर मैं पुरातनपंथी हूँ तो ऐसी ही चीजें चुनूँगा कुरान या गीता से, जो मेरे नजरिये के मुताबिक हो और उसे मजबूत करे। बाकि को मैं छिपा जाता हूँ। इसीलिए जब तक पूर्णता में कोई बात नहीं होगी तो दिक्कत होगी।

मैं कुरान की आयतों को दो हिस्सों में बाँटता हूँ- नार्मेटिव (आदर्शमूलक) और कांटेक्सट्य़ूअल (सन्दर्भगत)। जो चीजें उस वक्त के खास सन्दर्भ में आईं थीं यानी कांटेक्सट्य़ूअल आज लागू नहीं होंगी। जो आदर्श है, वह आज भी लागू होगी। कुरान में जितने मूल्य हैं, वह सब नार्मेटिव हैं। कुरान में इंसाफ एक नार्म है, बहुविवाह एक कांटेक्सट है। सो नार्म विल प्रिवेल ओवर कांटेक्सट।

मैं कुरान की आयतों को दो हिस्सों में बाँटता हूँ- नार्मेटिव (आदर्शमूलक) और कांटेक्सट्य़ूअल (सन्दर्भगत)। जो चीजें उस वक्त के खास सन्दर्भ में आईं थीं यानी कांटेक्सट्य़ूअल आज लागू नहीं होंगी। जो आदर्श है, वह आज भी लागू होगी। कुरान में जितने मूल्य हैं, वह सब नार्मेटिव हैं। कुरान में इंसाफ एक नार्म है, बहुविवाह एक कांटेक्सट है। सो नार्म विल प्रिवेल ओवर कांटेक्सट।
उस कांटेक्सट में बहुविवाह की इजाजत दी गयी लेकिन आदर्श की बरतरी बताते हुए कि ‘जस्टिस इज मोर फंडामेंटल दैन पॉलिगेमी`। मुसलमानों ने बहुविवाह को अहम बना लिया और इंसाफ को छोड़ दिया। मेरी सारी लड़ाई यही है कि ‘जस्टिस इज फंडामेंटल नॉट पॉलिगेमी।` इंसाफ नहीं होता है तो बहुविवाह की इजाजत नहीं हो सकती। इसलिए मूल्य स्थाई रहेंगे और क्वानीन बदलते रहेंगे क्योंकि एक समाज में उन्हीं मूल्यों के आधार पर एक तरह के कानून बनेंगे तो किसी और समाज में उन्हीं मूल्यों के आधार पर दूसरे कानून। इसीलिए लॉ कभी भी स्थाई नहीं हो सकता। वही बात शरीअत पर भी लागू होती है। कुरान के मूल्य कभी नहीं बदलेंगे। लेकिन उन मूल्यों के आधार पर बने कानून बदलते रहेंगे।

इकबाल अपने रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रीलिजियस थॉट इन इस्लाम` में बहुत साफ कहा है कि मुसलमानों की हर पीढ़ी को शरीअत के बारे में पुनर्विचार का अधिकार होना चाहिए। और शरीअत लॉ में बदलाव होना चाहिए। वह उसी समझ के तहत यह बात कह रहे थे कि सामाजिक जरूरत बदलती है। तुर्की में जो उस वक्त हो रहा था, उसका उन्होंने स्वागत किया। कमाल पाशा जो बदलाव ला रहे थे, वो उसकी काफी प्रशंसा कर रहे थे। उन्होंने कहा, जो काम पहले उलमा करते थे, उसे अब पार्लियामेंट को करना होगा। निर्वाचित प्रतिनिधि को करना होगा। वो लोग सामाजिक जरूरत के हिसाब से बदलाव के लिए आम सहमति पैदा करने का काम करेंगे। लेकिन उलमा इसे कभी तस्लीम नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनकी लीडरशीप जाती है। एक मसला लीडरशीप का भी है। सारे मसलक के नेता जो आपस में लड़ते हैं, वो वास्तव में सत्ता की लड़ाई है। चाँद के मसले पर भी जो होता है, वह यही है।

फतवों को आप किस रूप में देखते हैं?
मौलाना फतवे अपने-अपने मसलक (पंथ) के हिसाब से देते हैं। ससुर के बलात्कार की पीड़ित इमराना ने अपने बारे में दिये गये फतवे को नहीं माना। आज भी वह अपने शौहर के साथ रह रही है। शौहर ने भी नहीं माना उस फतवे को। अपनी बीवी को नहीं छोड़ा उसने। इसीसे से हम समझ सकते हैं कि फतवा कितना बाध्यकारी है। फतवा महज एक राय है, जो किसी आलिम द्वारा किसी खास मसले पर दिया जाता है। कोई माने न माने, यह उसकी आजादी का सवाल है। इसीलिए कहा जाता है कि इस्लाम में प्रीस्टहूड नहीं है। कोई यह नहीं कह सकता कि फतवा मानना ही पड़ेगा। (जारी…)

इसके पहले की कडि़यां

धर्म की प्रासंगिकता-1

शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com

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शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

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Engineer 1 इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत का पहला हिस्‍सा धर्म की प्रासंगिकता-1 थी। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। दूसरा हिस्‍सा पेश है-

मगर इंजीनियर साहब, मज़हब में तो इसके अलावा भी कई चीज़ें आती हैं जिनमें हम गैर बराबरी के भी विचार पाते हैं।
यह इसलिए कि परम्परा को धर्म का हिस्सा समझ लिया जाता है। यह सोच सही नहीं है। मेरी आस्था, मज़हब और उसके दिये हुए मूल्यों में है। परम्परा तो बदलने वाली चीज़ है, वह बदलती रहती है। यानी इस्लाम के संदर्भ में देखें तो दीन और शरीअत में फर्क है। दीन नहीं बदल सकता लेकिन शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए। शरीअत जड़ नहीं हो सकता। इस्लाम की जो भी परेशानियां आप देखते हैं, जैसे- हाल के दिनों में आये कई फतवे या औरतों के बारे में राय, वो सब शरीअत के नहीं बदलने की देन है। शरीअत गैर बराबरी की बात करता है पर यह गैर बराबरी कुरान के मूल्यों का हिस्सा नहीं है।

यह बात आप कैसे कह रहे हैं?
इस्लाम मध्ययुगीन सभ्यता/समाज में आया। उस वक्त कुरान के मूल्यों को मध्यकाल के नैतिक मूल्यों और मान्यताओं के तहत समझा गया। उस युग के प्रभाव के तहत ही कायदे कानून बनाये गये, वो उस वक्त के हिसाब से बेहतर था। कुरान की व्याख्या भी उसी रोशनी में हुई।
मैं मानता हूँ कि आज के दौर के मूल्य हैं -मानवीय सम्मान, मानवाधिकार, जेण्डर समानता, नागरिकता का विचार, समान अधिकार आदि कुरान की रोशनी में आज इन्हें बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इन मूल्यों को मध्ययुगीन सभ्यता में नहीं समझा जा सकता था।

चौदह सौ साल पहले एक खास सभ्यता, समाज और खास इलाके में एक मज़हब अस्तित्व में आता है। उस मज़हब के उसूल में आज के दौर के सवालों के जवाब तलाशना कहां की अक्लमंदी है?
यह समझना जरूरी है कि क्या बदल सकता है। मूल्य, कभी नहीं बदल सकते। सिद्धांत भी कभी नहीं बदल सकता। कुरान जो मूल्य देता है, वह स्थाई है। बहुत सारी चीजें कुरान में संदर्भ के साथ, उस समय के हालात के मुताबिक हैं। इसीलिए इस्लामी विद्वानों के बीच नासिख और मंसूख की भी बहस रही है। नासिख यानी जो किसी चीज को स्थगित करेगी और मंसूख, जिसे स्थगित किया जायेगा। यानी कुरान की कौन सी आयत, किस को, मूल्य के हिसाब से स्थगित करे, इस पर विचार होना चाहिए। हिन्दुस्तान में महान इस्लामी दार्शनिक शाह वलीउल्लाह ने इस पर बड़ी बहस की है। हमारे आज के उलमा इस उसूल को समझने को तैयार नहीं है।
हदीसों को लेकर भी परेशानी पैदा होती है। गैर अरब संस्कृति, जैसे- परिशयन, रोमन, कॉप्टिक संस्कृतियों में जब इस्लाम फैला तो नये मसले पैदा हुए। उलमा ने उन मसलों को उन्हीं संस्कृति की रोशनी में हल किया। हल करने की इसी कोशिश के दौरान हदीस की जरूरत पैदा हुई। जहां मुनासिब हदीस नहीं मिली, वहां नयी हदीस बनायी गयी। हदीस के अम्बार पैदा हो गये। फिर इन्हीं हदीसों की रोशनी में कानून बने। यही नहीं, जहां हदीस, कुरान की रूह के खिलाफ थी, उसे भी इस्तेमाल कर लिया गया। चूंकि उन्हें उस वक्त ऐसे ही हदीसों की जरूरत थी।

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं।
सारे शरई क्वानीन, इन हदीसों की रोशनी में बनाये गये। इसीलिए मैं कहता हूँ कि शरीअत में तब्दीली की जरूरत है जबकि कुरान के मूल्य हमेशा कायम रहेंगे। शरीअत में बदलाव होते रहे तो आज की समस्याओं का हल कुरान के मुताबिक मुमकिन है। जब हदीस को जड़ बना देंगे तो समस्या बनी रहेगी।
शरीअत के भी दो हिस्से हैं। पहला, इबादात और दूसरा, मुआमलात। इबादात में नमाज़, रोज़ा, हज, जकात आदि आते हैं। यानी इबादात, एक शख्स और उसके खुदा के बीच का रिश्‍ता है। मुआमलात यानी दो व्यक्तियों के बीच का रिश्‍ता। जैसे- शादी-ब्याह, तलाक, उत्तराधिकार, इंसानी हुकूक आदि। इबादात में बदलाव नहीं होना चाहिए। मुआमलात में बदलाव किये जा सकते हैं और किये जाने चाहिए। इसमें अगर बदलाव नहीं हुए तो परेशानी पैदा होगी। (जारी…)

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पहला हिस्‍सा - धर्म की प्रासंगिकता-1

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