लड़कियों की शाम

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 6 Comments »

इनकी कैसी साँझ?
इनकी ज़िंदगी में तो
हर वक्त है साँझ का धुँधलका
साँझ का क्यों रहे इन्हें इंतज़ार
क्या करें इस वेला में, यही सवाल लेकर आती है हर शाम
काश इस साँझ में ये भी करें ता-थया
उछलें-कूदें, मचाएँ धमाल
पर कहाँ हैं ये शाम
कोई इनके दिल से पूछे
ये तो चाहती जितनी दूर हो साँझ
उतना ही हो अच्छा
पर बिना शाम गुज़रे
नई सुबह भी तो नहीं आती
इसलिए गुज़ारनी होगी शाम हौसले से
लड़ना होगा अँधेरे से ताकि कदम बढ़े
एक नई सुबह की ओर

शाम का मतलब हर शख्स के लिए अलग-अलग है। बच्चे हों या जवान या फिर बूढ़े- सबकी साँझ अलग-अलग होती है। लड़की और महिलाओं की शाम भी वैसा ही नहीं होती जैसी कि लड़कों और मर्दों की।

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बेटियों का ब्‍लॉग (DaughtersClub: A New Blog)

जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 11 Comments »

sana 1 यह बेटियों का क्‍लब है। बेटियों के माँ-बाप का क्लब है। एक ऐसा ब्लॉग जिस पर बेटियों की बात होगी। हुआ यूँ कि कुछ दिनों पहले अविनाश, बेटी के बाप बने। मैंने बधाई दी। पूछा, ‘बेटी के बाप बनने से नाखुश तो नहीं।’ बोले, ‘कमाल करते हैं, नाखुश!!! मैं तो बहुत खुश हूँ। मैंने बेटी की दुआ की थी।’ तो मैंने कहा, ‘चलो बेटियों के माँ- बाप वाले क्लब में आप का स्वागत है।’ हम सब को इस बात पर फख्र है कि हम बेटियों के बाप हैं और बेटों के लिए परेशान नहीं। बीच-बीच में, मैं अविनाश को गाहे-बगाहे बातचीत में, बेटी का बाप कह कर ही पुकारता। जिंदगी यूँ ही बदस्तूर चल रही थी।

अचानक कल रात अविनाश का संदेसा आया। बेटियों का क्लब बन गया!!! यानी एक नया ब्लॉग http://daughtersclub.blogspot.com. माने या न माने अविनाश, के सिर पर हिन्दी ब्‍लॉग की दुनिया में एक और खुशनुमा शुरुआत करने का सेहरा बँध गया। इस क्लब की सदस्यता मुझे भी मिली है। आप भी जरूर देखें। …और अगर बेटियों वाले हैं … अपनी बेटियों को दिलो जान से प्यार करते हैं … बेटों को तरजीह नहीं देते हैं, तो हमारे साथ आप भी बेटियों का उत्सव मनाइये। देखिये बेटियों का ब्लॉग।

शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए

इंटरव्यू, इस्‍लाम Islam, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin 2 Comments »

Engineer 1 इस्लामी विद्वान, ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म` के प्रमुख और देश में फिरकापरस्ती के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में अग्रणी डॉ. असगर अली इंजीनियर से नासिरूद्दीन की हुई बातचीत का पहला हिस्‍सा धर्म की प्रासंगिकता-1 थी। यह बातचीत अन्‍यथा पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। दूसरा हिस्‍सा पेश है-

मगर इंजीनियर साहब, मज़हब में तो इसके अलावा भी कई चीज़ें आती हैं जिनमें हम गैर बराबरी के भी विचार पाते हैं।
यह इसलिए कि परम्परा को धर्म का हिस्सा समझ लिया जाता है। यह सोच सही नहीं है। मेरी आस्था, मज़हब और उसके दिये हुए मूल्यों में है। परम्परा तो बदलने वाली चीज़ है, वह बदलती रहती है। यानी इस्लाम के संदर्भ में देखें तो दीन और शरीअत में फर्क है। दीन नहीं बदल सकता लेकिन शरीअत को लगातार बदलते रहना चाहिए। शरीअत जड़ नहीं हो सकता। इस्लाम की जो भी परेशानियां आप देखते हैं, जैसे- हाल के दिनों में आये कई फतवे या औरतों के बारे में राय, वो सब शरीअत के नहीं बदलने की देन है। शरीअत गैर बराबरी की बात करता है पर यह गैर बराबरी कुरान के मूल्यों का हिस्सा नहीं है।

यह बात आप कैसे कह रहे हैं?
इस्लाम मध्ययुगीन सभ्यता/समाज में आया। उस वक्त कुरान के मूल्यों को मध्यकाल के नैतिक मूल्यों और मान्यताओं के तहत समझा गया। उस युग के प्रभाव के तहत ही कायदे कानून बनाये गये, वो उस वक्त के हिसाब से बेहतर था। कुरान की व्याख्या भी उसी रोशनी में हुई।
मैं मानता हूँ कि आज के दौर के मूल्य हैं -मानवीय सम्मान, मानवाधिकार, जेण्डर समानता, नागरिकता का विचार, समान अधिकार आदि कुरान की रोशनी में आज इन्हें बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इन मूल्यों को मध्ययुगीन सभ्यता में नहीं समझा जा सकता था।

चौदह सौ साल पहले एक खास सभ्यता, समाज और खास इलाके में एक मज़हब अस्तित्व में आता है। उस मज़हब के उसूल में आज के दौर के सवालों के जवाब तलाशना कहां की अक्लमंदी है?
यह समझना जरूरी है कि क्या बदल सकता है। मूल्य, कभी नहीं बदल सकते। सिद्धांत भी कभी नहीं बदल सकता। कुरान जो मूल्य देता है, वह स्थाई है। बहुत सारी चीजें कुरान में संदर्भ के साथ, उस समय के हालात के मुताबिक हैं। इसीलिए इस्लामी विद्वानों के बीच नासिख और मंसूख की भी बहस रही है। नासिख यानी जो किसी चीज को स्थगित करेगी और मंसूख, जिसे स्थगित किया जायेगा। यानी कुरान की कौन सी आयत, किस को, मूल्य के हिसाब से स्थगित करे, इस पर विचार होना चाहिए। हिन्दुस्तान में महान इस्लामी दार्शनिक शाह वलीउल्लाह ने इस पर बड़ी बहस की है। हमारे आज के उलमा इस उसूल को समझने को तैयार नहीं है।
हदीसों को लेकर भी परेशानी पैदा होती है। गैर अरब संस्कृति, जैसे- परिशयन, रोमन, कॉप्टिक संस्कृतियों में जब इस्लाम फैला तो नये मसले पैदा हुए। उलमा ने उन मसलों को उन्हीं संस्कृति की रोशनी में हल किया। हल करने की इसी कोशिश के दौरान हदीस की जरूरत पैदा हुई। जहां मुनासिब हदीस नहीं मिली, वहां नयी हदीस बनायी गयी। हदीस के अम्बार पैदा हो गये। फिर इन्हीं हदीसों की रोशनी में कानून बने। यही नहीं, जहां हदीस, कुरान की रूह के खिलाफ थी, उसे भी इस्तेमाल कर लिया गया। चूंकि उन्हें उस वक्त ऐसे ही हदीसों की जरूरत थी।

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं

हदीसों के मामले में माहिर इमाम बुखारी ने सात लाख से ज्यादा हदीसें इकट्ठा कीं पर जब उन्होंने पड़ताल की, तब बमुश्‍िकल छह हजार हदीसों को ‘सही’ का दर्जा दिया। इसी से अंदाजा लग सकता है कि ‘गलत’ हदीसों का कैसा अम्बार था। इतना छाँटने के बावजूद, काफी सारी समस्यामूलक हदीसें बची रह गयीं।
सारे शरई क्वानीन, इन हदीसों की रोशनी में बनाये गये। इसीलिए मैं कहता हूँ कि शरीअत में तब्दीली की जरूरत है जबकि कुरान के मूल्य हमेशा कायम रहेंगे। शरीअत में बदलाव होते रहे तो आज की समस्याओं का हल कुरान के मुताबिक मुमकिन है। जब हदीस को जड़ बना देंगे तो समस्या बनी रहेगी।
शरीअत के भी दो हिस्से हैं। पहला, इबादात और दूसरा, मुआमलात। इबादात में नमाज़, रोज़ा, हज, जकात आदि आते हैं। यानी इबादात, एक शख्स और उसके खुदा के बीच का रिश्‍ता है। मुआमलात यानी दो व्यक्तियों के बीच का रिश्‍ता। जैसे- शादी-ब्याह, तलाक, उत्तराधिकार, इंसानी हुकूक आदि। इबादात में बदलाव नहीं होना चाहिए। मुआमलात में बदलाव किये जा सकते हैं और किये जाने चाहिए। इसमें अगर बदलाव नहीं हुए तो परेशानी पैदा होगी। (जारी…)

इसे भी पढ़ें

पहला हिस्‍सा - धर्म की प्रासंगिकता-1

(पेशे से पत्रकार नासिरूद्दीन इस वक्त हेल्थ एंड पॉपुलेशन इन्नोवेशन फेलोशिप के तहत मुसलमान औरतों के हक पर काम कर रहे हैं। ईमेल- genderjihad@gmail.com)

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