बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा

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भ्रूण का लिंग परीक्षण करने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटरों की चाँदी

किसी काम की नहीं पीपीएनडीटी सलाहकार समिति

नासिरूद्दीन हैदर खाँ

Foetus बेटा बताया बेटी हो गई… लायक नहीं हैं फिर भी अल्ट्रासाउंड मशीन चला रहे हैं … सरकारी डॉक्टर हैं पर लिंग जाँच कर कानून की खूब धज्जियाँ उड़ा रहे हैं… और करें भी क्यों न? न हींग लगे न फिटकरी ऊपर से रंग भी चोखा! इसमें तो मुनाफा ही मुनाफा है। और जिन पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी है, वह सब जानकर भी असहाय बने हैं। बांदा और चित्रकूट समेत सब जगह बिटिया को जड़ से खत्म करने के धंधे की यह विभत्स राम कहानी है।

(बुंदेलखंड में लिंग जाँच के बारे में एक सीरिज मैंने पाँच साल पहले लिखी थी। ये सिलसिलेवार तरीके से ‘हिन्दुस्तान’ में छपीं। जेण्डर जिहाद के लिए हिन्‍दुस्‍तान से साभार यहाँ फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि इस समस्या के बारे में जमीनी हकीकत समझने में आसानी हो।- नासिरूद्दीन)

नाकाबिल के हाथ मशीन- अल्ट्रासाउंड मशीन किसके हाथ में होगी, कानून इसके बारे में साफ है। भले ही कानून लागू कराने वालों की नजर धुँधली हो। मानकों के उलट बांदा से लगभग 40 किलोमीटर दूर अतर्रा कस्बे में एक अल्ट्रासाउंड सेंटर है। डॉक्टर एमबीबीएस नहीं हैं। रेडियोलॉजिस्ट नहीं है पर उनके नाम मशीन पंजीकृत है। इसी क्लीनिक में महिला रोग विशेषज्ञ भी बैठती हैं। आसपास के डॉक्टरों का भी यही हाल है। पता चला कि यहाँ आप लिंग जांच करा सकते हैं। इस क्लीनिक की जाँच की गुणवत्ता क्या होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसी तरह कर्वी में एक साहब की अल्ट्रासाउंड मशीन है। शहर से हटकर गाँवों के करीब। यहाँ किस माँग को पूरा किया जा रहा है? डॉक्टर साहब इलाहाबाद में सरकारी नौकरी में हैं और कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। कानून बना-लिंग जाँच नहीं होगी, पर होती है। साहब हफ्ते में एक दिन आते हैं। बाकी दिन, जानकारों के मुताबिक, पास के स्वास्थ्य केन्‍द्र के एक-दूसरे सरकारी डॉक्टर यहाँ ‘सेवा’ देते हैं। अल्ट्रासाउंड चलाने की योग्यता इनकी इतनी ही है कि ‘बेटी’ को ‘बेटा’ देखते हैं।

कानून इनके ठेंगे पर- दूसरी ओर, कानून कहता है कि लोगों को जागरूक करने के लिए सेंटर में लिखा होगा कि यहाँ लिंग जाँच नहीं होती है। साथ ही पंजीकरण प्रमाण पत्र भी लगाना होगा। दोनों ऐसी जगह पर चस्पा होना चाहिए जहाँ ये आसानी से दिख जाएँ। इसके उलट बांदा व कर्वी में अधिसंख्य जगहों पर इनका पता ही नहीं चला। उलटे डॉक्टर लोगों को किसी को भी जाँच के बारे में बताने से मना करते हैं। समझते हैं कि उसे जेल हो जाएगी। और उनके लिए लिंग जाँच के खतरे को उठाने के एवज में मुँहमाँगी रकम पाते हैं।

बेटा बताया हुई बेटी!

अल्ट्रासाउंड से किस तरह कमाई की जा रही है, इसका उदाहरण कर्वी की ओमवती है। इसने ‘क’… अल्ट्रासाउंड सेंटर में पाँच सौ रुपये में जाँच कराया। वह बताती है, डॉक्टर ने कहा, ‘मिठाई खिलाओ लड़का है। ससुराल वालों ने भी खूब देखभाल की।’ पर हुई बेटी। अब तानों की कमी नहीं। उसके परिजनों को इस ‘भूल’ पर बड़ा अफसोस है। यह घटना कम से रानी जैसे को यह कहने का मौका जरूर दे रही है, ‘मशीनौ गलत होत हवै।’ हालाँकि ऐसी गलतियाँ भी होंगी जहाँ लड़कों के भ्रूण को लड़की बताया जा रहा होगा और पुत्र भ्रूण को खत्म किया जा रहा होगा।

कितना मुनाफा चाहिए- यह धंधा कितना चोखा है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। अल्ट्रासाउंड करने वाले एक डॉक्टर साहब बताते हैं कि सामान्य जाँच के लिए 350 रुपए लिया जाता है। इसमें 100 रुपये जाँच के लिए भेजने वाले डॉक्टर का होता है। अल्‍ट्रासाउंड की लागत क्या आती होगी, पूछने पर वह बताते हैं, मुश्किल से चालीस रुपये। वह भी तब जब ग्राफिक रिपोर्ट देनी हो। लिंग जाँच के लिए न तो कोई कागज देना है और न ही रिपोर्ट। यानी सिर्फ देखकर बताना है …और कीमत 700 से ढाई हजार रुपये तक। (यह कीमत पाँच साल पहले थी।) मुनाफे का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है! फिर क्यों छोड़े कोई लिंग जाँच के धंधे को?

कानून के बारे में एक मशहूर और काबिल डॉक्टर साहब कहते हैं, यह तो इंस्पेक्टर राज जैसा है। जब कोई चाहेगा, निरीक्षण करने पहुँच जायेगा। वह बताते हैं कि लड़का-लड़की बताने के लिए लोगों का भारी दबाव रहता है। जैसी हालत देखी वैसा दाम लेते हैं! चार सौ से लेकर ढाई हजार तक।

कौन करे निगरानी- दूसरी ओर, कहीं लिंग जाँच तो नहीं हो रही, यह देखने के लिए हर जिले में सलाहकार समिति है। कर्वी में सलाहकार समिति की सदस्य सरस्वती बताती हैं ‘पिछले एक साल में पीपीएनडीटी कमेटी की सिर्फ एक बैठक हुई इसमें भी ज्यादातर सदस्य नदारद ही रहे।’ वह जानती हैं कि शहर में कहाँ लड़का/लड़की बताया जा रहा है। गाँवो-कस्बों से लोग आते हैं। यहाँ लिंग जाँच और एबार्शन क्लीनिक का गठजोड़ भी देखने को मिलता है। सरस्वती का मानना है कि चूँकि एबार्शन क्लीनिक चलानी है, इसमें ज्यादा पैसा है, इसलिए जितने लोग टेस्ट कराते हैं उसमें 90 फीसदी को यह लड़की ही बताते हैं। झाँसी और सतना से भी यहाँ के लोग इस काम के लिए जाते हैं, यह जानकारी सरस्वती देती हैं।

यह अदृश्य अपराध है। इसमें किसी को रंगे हाथ पकड़ना कठिन है। रंगे हाथ पकड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो प्रशासनिक अमले में नहीं दिखती। डॉक्टर-रेडियोलॉजिस्ट- अल्ट्रासाउंड सेंटर और पुत्र चाह के गठजोड़ को तोड़े बिना इस सिलसिले को रोकना मुश्किल होगा।

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2 Responses to “बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा”

  1. ghughutibasuti Says:

    वर्षों पहले जब ये परीक्षण शुरू हुए थे तो विज्ञापन में कहा जाता था कि आज तीन सौ चार सौ खर्च करो और भविष्य में लाखो बचाओ। खैर यह जान कर मुस्कराई कि लालच के चक्कर में पुरुष भ्रूण को भी स्त्री बताया जा रहा है और ऐसे दोनों की ही ह्त्या हो रही है। काश बेटों के शौकीनों को पता चलता कि वे बेटा मार कर आए हैं।
    घुघूती बासूती

  2. Gender Jihad जेण्‍डर जिहाद » Blog Archive » बिन मारे बैरी मरै, या सुख कहाँ समाय Says:

    [...] बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धं… [...]

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