महिला आंदोलन की जरूरत है मर्दों की भागीदारी

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आंदोलन को ही आगे बढ़ाएगी मर्दों की साझेदारी

नासिरूद्दीनnasir 6 july new

ढाका। बराबरी के लिए और हिंसा के खिलाफ आवाज तो महिला संगठन और आंदोलन उठाते रहे हैं। अब मर्दों की साझेदारी की बात हो रही है… तो क्या महिला आंदोलन इसके लिए तैयार है? सवाल उठ रहे हैं कि कहीं आंदोलन को पुरुष अपने कब्जे में तो नहीं ले लेंगे? आंदोलन अपने मकसद से भटक तो नहीं जाएगा? ढाका में पिछले महीने आयोजित दक्षिण एशियाई देशों के संवाद में भी ऐसे कई सवाल हवा में तैरते रहे।

संयुक्त राष्ट्र महिला विकास कोष (यूनीफेम), दिल्ली की सलाहकार मधुबाला नाथ कहती हैं, ‘जहाँ जेण्डर की समझ गड़बड़ होगी, वहीं महिला आंदोलन को परेशानी होगी। .. फिर यह तो नैरोबी में विश्व महिला सम्मेलन में तय हुआ था कि जेण्डर समानता के लिए मर्दों के साथ काम करना जरूरी है।’

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पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया। इसमें भारतीय दल में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला। इस बातचीत के इर्द गिर्द मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ में एक सीरिज लिखी। अब उसे जेण्‍डर जिहाद पर पेश कर रहा हूँ।

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दूसरी ओर, इस्लामाबाद की संस्था ‘रोजन’ की सह निदेशक मारिया रशीद कहती हैं कि इतने सवाल कहाँ उठते हैं। हम महिला संगठन हैं। हम तो दस सालों से मर्दों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। यह जरूरत भी आंदोलन से ही पैदा हुई। महिलाओं ने मर्दों को हमेशा प्रॉब्लम के रूप में देखा है अब उन्हें हल के रूप में भी देखना होगा। मर्दों को भी हिंसा का असर समझने के लिए आपस में होने वाली हिंसा को देखना होगा। वहीं इस्लामाबाद की ही डॉ. रखशंदा परवीन कहती हैं कि सच तो यह है कि महिला आंदोलन से इस मुद्दे पर ज्यादा गुफ्तुगू नहीं हुई। हाँ, कुछ चीख-पुकार जरूर मचेगी, लेकिन जुड़ाव की कोशिश जरूरी है।

जबकि मदुरैई की संस्था ‘एकता’ की निदेशक और आंदोलन से जुड़ीं विमला चंद्रशेखर कहती हैं कि मर्दों की भागीदारी हमारी जरूरत है। जब हम औरतों के पास काम करने जाते हैं तो वे कहती हैं कि हमारे पास कुछ करने की ताकत नहीं है। आप मर्दों के साथ क्यों नहीं बात करतीं? महिलाओं ने ही हमें इस राह पर ढकेला है।

हालाँकि डॉ. रखशंदा आगाह करती हैं कि ‘एक बात ध्यान रखें कि मर्दों की भागेदारी की वकालत कर हम महिला आंदोलन से प्रतियोगिता करने नहीं निकले हैं। मैं जेण्डर समरसता में यकीन करती हूँ। हाँ, संसाधनों के बँटवारे को लेकर जरूर मुश्किल आएगी।’ तो मारिया का कहना है, ‘गौर करने वाली बात यह है कि मर्दों की भागीदारी पर ज्यादा जोर कहीं अलगाव न पैदा कर दे।’ लेकिन मधुबाला की राय है, ‘महिला आंदोलन से मर्दों की इस मुहिम में शामिल होने के मुद्दे पर बात की जाएगी। यह उनके काम को ही आगे बढ़ाएगा।’ महिला संगठनों को उनकी सलाह है, ‘मर्दों की भागीदारी से डरने की कतई जरूरत नहीं है।’

विमला एक अहम बात की ओर ध्यान दिलाती हैं, ‘… सारे मर्द एक जैसे नहीं होते। मर्दों पर ‘मर्दानगी’ का बोझ है। समाज भी मर्दों से खास तरीके से व्यवहार करने की उम्मीद

करता है। उन्हें हिंसक बनाता है और उस हिंसा को वैधता देता है। इसे समझने की जरूरत है।’

इन सबका कोई फायदा होगा? मधुबाला के मुताबिक, ‘यूनीफेम मर्दों की भागेदारी और साझेदारी को जरूरी मानता है। इसके फायदे होंगे। एक उदाहरण देखें- मर्दों के साथ काम कर उनके खतरनाक व्यवहार को रोका जा सकता है। इससे एचआईवी जैसे संक्रमण से औरतों को बचाने में मदद मिलेगी।’ वहीं मारिया का अनुभव है कि मर्दों के साथ काम करने का असर दिख रहा है। वह बताती हैं, ‘हमने पुलिस के साथ काम किया। उनके व्यवहार और काम में फर्क आया है।’

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