‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

कविता, घरेलू हिंसा Domestic Violence, जेण्डर जिहाद Gender Jihad Add comments

तीन)

अकड़ते हो

घमंड में चूर।

नहीं थकते शेखी बघारते

अपने को ‘मर्द’ कहते हो women

पर बड़े बेशर्म हो भई।

भैंस/स्कूटर/ कलर टीवी

या फिर चंद पैसे…

नहीं मिले तो

हिचकते नहीं

मारने से संगनी को!

चार)

भैंस चाहिए

स्कूटर और कलर टीवी भी

फ्रिज है तो माइक्रोवेव ओवन चाहिए

हाँ, अपना फ्लैट भी होना चाहिए

क्यों?

दुकान के लिए पगड़ी मिल जाती तो क्या कहने

और जिंदगी शुरू करने के लिए

थोड़ा सा कैश मिल जाता तो क्‍या खूब होता

नहीं?

…..

…..

अगर नहीं मिला?

तो नहीं चाहिए

‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

तो नहीं रहेगी

‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

5 Responses to “‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!”

  1. mahendra mishra Says:

    भैस कलरफुल टी.वी. सुन्दर सुशील वधू चाहिए …. मजेदार पोस्ट. बहुत

  2. sahil Says:

    ……
    to nahi rahegi
    ’sundar-shusheel-sanskaari’ bahu.

    wakai…

  3. kashif Says:

    तो नहीं चाहिए
    ‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!
    तो नहीं रहेगी
    ‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

    بہت خوب

  4. saurabh Says:

    to aap bhi kavi ho gaye. ab to buch ke rehna padega

  5. Sanjay Sinha Says:

    thanks it would help us

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