सहती है क्यों औरत?

कविता, घरेलू हिंसा Domestic Violence, जेण्डर जिहाद Gender Jihad, नासिरूद्दीन Nasiruddin Add comments

छह)

तुम पूछते हो

सहती है क्यों औरत?

जवाब क्यों नहीं देती?

‘‘पिता-पति-पुत्र ही हैं स्त्री के रक्षक

बाप-शौहर-बेटा है निगहबान इसका

खानदान का नाम चलाता है बेटा

बोझ की खान है बेटियाँ

मर्द कमाता है, खिलाता है, पैसा लाता है

लाठी है बुढ़ापे की

इसीलिए दर्जा भी ऊँचा है उसका

.. और फिर औरत

भोग की वस्तु है

कहाँ मर्द- कहाँ औरत’’

तुमने रचे शास्त्र, गढ़े नियम,

बनाई मर्यादाओं की घेराबंदी

जवाब तुम्हारे ही पास है

कैसा क्रूर मजक

फिर भी करते हो सवाल

सहती है क्यों औरत?

5 Responses to “सहती है क्यों औरत?”

  1. Sahil Says:

    Janab aapke sabhi lekh aur in sabhi kavitaoN ko padha. wakai har kavita ek prishn man me chhodkar jati hai. sare aise sawal jo sadiyoN se jas ke tas mauzud haiN.
    apko bahut-bahut sadhuwad jo nirantar is mudde ko apni lekhni se kuredte rahte hain.

  2. Vinod Varshney Says:

    नहीं अब नहीं सहेंगी औरतें
    और न ही सह रहीं
    दिन ब दिन सिखा रही हैं सबक
    उन उल्लुओं को जो नहीं देख रहे सबेरा
    नहीं पढ़ रहे इबारत
    कि है यह वक्त
    मिलजुल कर खोजने का नई डगर

  3. ghughutibasuti Says:

    बहुत सही मुद्दे पर सही लिखा है।
    घुघूती बासूती

  4. Ganganand Says:

    recommended reading आशापूर्णा देवी की उपन्यासत्रयी
    ‘प्रथम प्रतिश्रुति, स्वर्णलता, बकुल कथा’
    परम्परा में नारी व्यक्ति नहीं, परिवार समाज के अवयव रूप में मर्यादित है, आधुनिकता/ प्रगतिशीलता उसे व्यक्ति की पहचान देने का अवसर प्रस्तुत करती है।
    आधुनिकता / प्रगतिशीलता महजब या धर्म से पुष्टि नहीं पा सकते।

  5. nishamittal Says:

    samasya ka gyan sambhavta sabko hai avashyakta hai samadhan khojne ki nari ko uska sthan samman dilane ki

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