घायल पंखों की ऊँची उड़ान
नवीन जोशी
शायद आपने फ्ले
विया एग्निस का नाम सुना हो या उन्हें जानते भी हों। वे मुंबई में रहती हैं और महिलाओं के हक के लिए देश भर में लड़ने वाली वकील और सक्रिय कार्यकर्ता हैं। ‘घरेलू हिंसा’ पर उन्होंने काफी काम किया है- एक तरह से दिशा देने वाला शोध। ‘मजलिस’ संस्था की मार्फत फ्लेविया महिलाओं और बच्चों को कानूनी मदद दिलाती हैं। कानून की कई किताबें उन्होंने लिखी हैं और आत्मकथा भी। यह आत्मकथा ‘माई स्टोरी ऑवर स्टोरी, रिबिल्डिंग ब्रोकन लाइव्स’ काफी चर्चित रही। पत्रकार साथी नासिरुद्दीन हैदर खाँ ने हाल ही में इसका हिन्दी अनुवाद पेश किया, ‘परवाज’ नाम से। ‘परवाज’ पढ़ी तो अहसास हुआ कि फ्लेविया की आज की कामयाबी, शोहरत और महिलाओं के हक के लिए लड़ने के अपने जुनून के पीछे घरेलू हिंसा की कितनी लंबी यातना और उससे उबरने की कैसी जद्दोजहद छुपी है।
शुरुआती पन्नों में ही वे लिखती हैं- ‘‘पहली बार जब उन्होंने कहा ‘मैं तुम्हारी पिटाई करूँगा’ तो मैंने सोचा, वह मजाक कर रहे हैं। ये अल्फाज़ मेरी जि़न्दगी में अब तक किसी ने मुङासे नहीं कहे थे। पहली बार उन्होंने अपने हाथ से मेरी पिटाई की तो मुङो गहरा सदमा लगा। दूसरी बार उन्होंने लकड़ी के हैंगर से मेरी पिटाई की। मैंने सोचा यह सच नहीं है, मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता, तीसरी बार बेल्ट का इस्तेमाल हुआ। बक्कल से नाक पर चोट लगी और नाक की हड्डी टूट गई। मैं सन्न रह गई। दर्द से ज्यादा मायूसी से। इसके बारे में तो किसी ने मुङो चेताया भी नहीं था-शादी का मतलब यह भी होता है!’’
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यह 1967 का वाकया है जब फ्लेविया की शादी हुई। ‘पति थे लंबे, खूबसूरत। बड़ी कंपनी में सहायक सचिव। तनख्वाह चार अंकों में।’ लेकिन थे वे पक्के दम्भी पुरुष। देखिए- ‘‘मैं अपनी अम्मी की चिट्ठी पढ़ रही थी। इसी बीच वह आ गए। उन्होंने मुङो देखा और हुक्म दिया-
‘साफी गन्दी पड़ी है, जाओ जाकर धोओ।’
मैंने कहा-बाद में धो दूँगी और फिर चिट्ठी पढ़ने लगी।
‘-यह मेरा घर है, यहाँ मेरा हुक्म चलेगा। बात कैसे मानी जती है, मै तुम्हें सिखाता हूँ।’
‘‘अम्मी की चिट्ठी फाड़ दी गई। मेरे सिर को दीवार से टकरा दिया गया। मुङो घसीटकर फर्श पर पटक दिया और गंदे साफी के साथ मुङो गुसलखाने में बंद कर दिया गया। तीन घण्टे बाद जब दरवाज खुला, तो मेरे मुँह से निकला-‘आप मेरे जिस्म को तोड़ सकते हैं लेकिन मेरी रूह को खत्म नहीं कर सकते।’’
फ्लेविया का प्रतिरोध पति पर कोई असर नहीं छोड़ता, बल्कि और भी पिटाई हो जाती और कभी तो इतनी ज्यादा कि उसे सिर्फ फटे कपड़ों में ही घर छोड़ना पड़ता। पिटाई का कारण? फ्लेविया अक्सर समझ ही नहीं पाती कि ‘मेरी पिटाई आखिर हुई क्यों?’ कई बार माँ के यहाँ भागी, कई बार दोस्तों-रिश्तेदारों के यहाँ पर हर बार ‘परिवार और घर बचाने’ के नाम पर और ‘बच्चों के वास्ते’ फ्लेविया को ‘घर’ लौटना पड़ता। ‘घर बचाने’, ‘बच्चों के वास्ते’ और ‘समाज का हवाला’ देकर स्त्री को क्या-क्या सहना पड़ता है-इसे स्त्री से अच्छी तरह कौन समझ सकता है। घर में पीटी जाती स्त्री की चीख को ‘आपसी’ मामला कह कर टाल दिया जता है। फ्लेविया लिखती हैं-‘कई बार तो जबर्दस्त पिटाई के बाद खूबसूरत सिल्क साड़ी पहन, मैच करती हुई ज्वेलरी और करीने से सँवारे गए चेहरे के साथ मैं पार्टियों में जती या घर आए मेहमानों का दिल बहलाती। हालाँकि मेरी रूह भारी तकलीफ से कराहती रहती।’ ताज्जुब नहीं कि घरेलू हिंसा कोई मुद्दा नहीं बन सका।
इन वर्षो में फ्लेविया के तीन बच्चे हुए क्योंकि वह अंतत: पत्नी थी- खरीदा हुआ एक जिस्म। ‘‘हर बार मेरी जबर्दस्त पिटाई के बाद वह मुझसे समझौता करते और इसका एक ही मतलब होता…। कभी-कभी तो वह रोने ही लगते और मैं पूरी तरह उनकी बाँहों में पिघल जती।’’
लेकिन तन और धन से टूटी फ्लेविया ने मन मजबूत रखा, हालाँकि घायल वह भी कम नहीं था। बच्चों की परवरिश करनी थी, उन्हें पढ़ाना था और अपने हालात से भी उबरना था। पुलिस, अदालत और पादरी के सामने गिड़गिड़ाने से मदद मिलना तो दूर, और भी मुसीबतों से, इस तंत्र की स्त्री विरोधी प्रवृत्तियों से उसका सामना होने लगा।
चर्च में हुई एक मीटिंग की मार्फत फ्लेविया कुछ औरतों के सम्पर्क में आई जो बलात्कार पीड़ित एक लड़की की मदद करना चाहते थे। यहाँ से फ्लेविया के लिए एक खिड़की खुलती है जो उसे इस दुनिया में स्त्रियों पर हो रहे तरह-तरह के अत्याचारों के तकलीफ देह सिलसिले से परिचित कराती और इनसे निपटने के लिए तैयार होने का संकल्प और ऊर्जा देती है। घर में मिलने वाले शारीरिक-मानसिक अत्याचारों और तीन बच्चों को बेहतर नागरिक बना सकने की जद्दोजहद के बीच टूटी-घिरी फ्लेविया के लिए यहाँ से वह सफर शुरू होता है जो उन्हें आज के इस मुकाम पर लाता है जहाँ न केवल वे एक व्यक्ति के रूप में अपना स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन बिता रही हैं, बल्कि वह अनेक प्रताड़ित औरतों के लिए संरक्षण संघर्ष और सहायता की धुरी बनी हुई हैं। लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था- बहुत कठिन और तोड़ देने वाला था। अनेक मौके आए जब फ्लेविया को लगा कि वे हार जएँगी, लेकिन जितनी ही विपरीत स्थितियाँ बनी, लड़ते रहने और आगे बढ़ने का फ्लेविया का संकल्प मजबूत होता गया
। इन्हीं विकट दिनों में फ्लेविया ने, जो ग्रेजुएट तक नहीं थी, पढ़ाई भी जारी रखी। उस पुरुष ने जो उनका पति था, उन्हें पढ़ने न देने और इम्तहान से अलग रखने के लिए हर साजिश की, बच्चों तक पर जुल्म किए। लेकिन फ्लेविया कलेजा मजबूत किए रहीं। बच्चों ने भी इस लड़ाई में उनका पूरा साथ दिया। वे इम्तहानों में कामयाब हुईं और जीवन में भी।
फ्लेविया ने जब 1981 में बंबई की कांफ्रेंस में घरेलू हिंसा पर किए गए अपने अध्ययन पर पर्चा पढ़ा तो मर्द विद्वानों की प्रतिक्रिया धक्का पहुँचाने वाली थी। कुछ ने इस अध्ययन को ‘कार्यकर्ताओं की राय’ कहकर खारिज किया और कुछ ने कहा कि हमारे समाज में ‘बीवी की पिटाई’ जैसी कोई समस्या है ही नहीं, यह सब ‘पश्चिमी फितूर’ है। ऐसे काम से तो भारतीय परिवार टूटने लगेंगे। उधर, असलियत यह थी कि फ्लेविया जहाँ जाती, मुंबई के संभ्रांत घरों से लेकर झोपड़-पट्टियों तक और देश-विदेश के सम्मेलनों तक उन्हें हर जगह पतियों द्वारा बेतरह सताई जा रही पत्नियों की डरा देने वाली कहानियाँ सुनने को मिलतीं। 1982 में जब वे मांट्रियल (कनाडा) के सम्मेलन में पर्चा पढ़ने बुलाई गई तो ‘‘मुङो यह देखकर काफी ताज्जुब हुआ कि सम्मेलन में मारपीट की शिकार मैं अकेली औरत नहीं थी। मेरी मुलाकात एक ऐसी औरत से हुई जिसके शौहर ने उस पर्चे की पहली कॉपी फाड़ डाली थी, जो पर्चा वह इस सम्मेलन में पढ़ने वाली थी (ठीक ऐसा ही फ्लेविया के साथ पहले हो चुका था, जब पर्चा ही नहीं फाड़ा गया बल्कि उधार का टाइपराइटर भी सिर पर फेंका गया था।) एक दूसरी औरत ने एक अफ्रीकी उपन्यासकार का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह उसकी पहली पांडुलिपि उसके शौहर ने जला डाली। … हमें इस बात पर हैरत थी कि तहजीब, नस्ल, वर्ग और मजहब अलग-अलग होने के बावजूद हमारे उत्पीड़न में काफी समानता थी।’’
दरअसल यह धर्म, नस्ल या वर्ग का मसला है भी नहीं। मसला है स्त्री को तरह-तरह से दबाए रखने का, उसे दास बनाए रखने का, पुरुष के वर्चस्व का। और घर में पिटाई इसके लिए पुरुष का बड़ा हथियार रहा है। फ्लेविया की यह आत्मकथा इस तथ्य को बड़े असरदार ढंग से सामने रखती है।
एक और आब्जवरवेशन देखिए-अत्याचारी पति से निजत पाने के लिए फ्लेविया का मुकदमा चल रहा था, जो बार-बार फ्लेविया के खिलाफ मुड़ जता। वजह? ‘‘..सच तो यह है कि नागरिक स्वतंत्रता के बारे में वकीलों की सोच में दो मासूम बच्चियों का सम्मान के साथ रहना, उनकी दिमागी शांति, भावनात्मक सुरक्षा और शारीरिक हिफाजत की कोई जगह नहीं थी। वकील ने तर्क दिया- अपील दायर करने वाली, महिला मुक्ति आंदोलन से जुड़ी हैं। इस बात में जो अनकहा कटाक्ष था, वह यह कि यह तो महिला की मुक्ति की बात करने वाली है, इसलिए यह अच्छी माँ बनने लायक नहीं है। शौहर… वकीलों की जमात… काउंसिलर…जज…नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाले…उफ! मर्दों का भाईचारा देखने लायक था। कितना मजबूत है यह भाईचारा, कम से कम औरतों के खिलाफ तो है ही।’’
बहरहाल, लम्बे संघर्ष के बाद फ्लेविया ने एक मुक्त इनसान की जगह बनाई, बच्चों ने अपना आजाद संसार पाया और फ्लेविया लिखती हैं- ‘‘अमरीका में आजादी के बाद दासों की जिस तरह हालत हुई थी, उसी तरह मुझे भी अपने को मुक्त होना सिखाना पड़ा। पीट-पीट कर तोड़ दी गई एक औरत से अलग शख्सियत के रूप में पहचान, इस समाज में एक व्यक्ति की हैसियत-मुक्ति का यह भी तो मतलब था।’’ और जमाने के लिए एक बड़ा मतलब था ‘घरेलू हिंसा’ को एक ज्वलंत मुद्दे के रूप में स्वीकार किया जाना और आज तो बाकायदा घरेलू हिंसा कानून (2006) बन चुका है जो स्त्रियों के लिए एक बेहतर हथियार साबित हो सकता है।
फ्लेविया की इस आत्मकथा का एक और सकारात्मक पक्ष यह है कि अपने पर हुए अत्याचारों को उन्होंने तरस खाए जाने के लिए या रुलाने के लिए नहीं लिखा है। पूरे विवरण इतने आब्जेक्टिव ढँग से लिखे गए हैं कि आप घरेलू हिंसा और उसकी प्रकृति को समझ सकते हैं। और यही असली मकसद भी है। ‘‘आसान नहीं है अपनी रूह को उधेड़ना और अपने जज्बात व तजुर्बो को नंगा कर देना ताकि हर कोई उन्हें देख सके। यह काम किसी जाती फायदे की उम्मीद से या फिर दया का पात्र बनने के लिए नहीं किया गया । मकसद सिर्फ इतना है कि मारपीट की शिकार औरतों के हालात की सच्चई दुनिया के सामने आ सके।’’ तभी वह संघर्ष, जो फ्लेविया ने किया, कामयाब होता है और प्रेरक बनता है कि हाँ, इससे उबरा जा सकता है, बस कोशिश करनी होगी।
और अंत में यह कि नासिरुद्दीन ने इस आत्मकथा का इतना बेहतरीन अनुवाद किया है कि जैसे आप सीधे फ्लेविया से मुखातिब हों। सिर्फ अनुवाद नहीं है, यह एक स्त्री के सम्पूर्ण अस्तित्व के संघर्ष को शिद्दत से समझने-समझने की मुहिम का हिस्सा है। ऐसा इसलिए हो सका कि नासिरुद्दीन खुद भी स्त्रियों के मुद्दों पर व्यापक शोध अध्ययन से जुड़े हैं और बड़ी संवेदनशीलता से उस जटिल दुनिया की गिरहें समङाने में लगे हैं। किताब की भूमिका में वे लिखते हैं-‘‘जब पहली बार मैंने उनकी जिन्दगी के संघर्ष की कहानी अंग्रेजी में पढ़ी तो लगा कि इसे तो ज्यादा से ज्यादा हिन्दुस्तानी जबानों में आना चाहिए। वहीं तो ऐसी चीजों की सख्त जरूरत है।’’
हाँ, यह किताब हर भाषा में हर घर में पहुँचनी चाहिए। स्त्रियों के लिए तो यह पुस्तक जरूरी है ही- मर्दो के लिए भी कम जरूरी नहीं।
(नवीन जोशी, ‘हिन्दुस्तान’ लखनऊ में वरिष्ठ स्थानीय सम्पादक हैं। वे एक संवेदनशील साहित्यकार भी है। इस टिप्पणी का छोटा हिस्सा ‘हिन्दुस्तान’ में छपा है। साभार के साथ।)
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यह पुस्तक अवश्य पढ़ूँगी। जैसे एक उम्र हो जाने पर नवयुवकों व नवयुवतियों को समझदार माता पिता सैक्स व विवाह आदि पर पुस्तकें पढ़ने को देते हैं वैसे ही शायद ऐसी पुस्तकें भी देनी चाहिएँ। साथ ही अपने बच्चों , विशेषकर बच्चियों को यह बात अच्छी तरह से समझा देनी चाहिए कि अत्याचार किसी भी हालत में नहीं सहना है। शारीरिक तो कभी भी नहीं। पहली बार हाथ उठे तो सम्बन्ध समाप्त कर दो। हाथ उठाने वाले व्यक्ति के साथ रहने से तो अकेला रहना बेहतर है। समाज की चिन्ता बाद में करो, सबसे पहले अपनी करो। यदि अपनी ही नजरों में गिर गए तो समाज में क्या सिर उठाकर चल पाओगे?
जब तक कुछ वर्ष साथ रहकर अपने साथी को समझ नहीं लेते तब तक बच्चों को संसार में लाना बच्चों के साथ अन्याय है।
पुस्तक का अनुवाद करने के लिए नासिर जी का आभार। आशा है अधिक से अधिक लोग यह पुस्तक पढ़ेंगे।
इस विषय में जानकारी देने के लिए नवीन जोशी जी का आभार।
घुघूती बासूती
फ्लेविया एग्निस को सलाम जिसने हार नहीं मानी और घायल पंखो से ऊची उड़ान भरी .खुद की ही नहीं दूसरो की भी रक्षक बनी ,नवीन जी का आभार ..,जरूरी किताब …..
फ्लेविया एग्निस को सलाम जिसने हार नहीं मानी और घायल पंखो से ऊची उड़ान भरी .खुद की ही नहीं दूसरो की भी रक्षक बनी ,नवीन जी का आभार ..,एक जरूरी किताब …..
Wow, very touching publications ..
very touching…
very brave effort on part of Ms Flavia. yes,if this wife beating is not common, then its not rare either. i just told one of my friends that someone has written part of ur autobiagraphy… read it.